Gujiya History होली और गुझिया. दोनों में गजब का रिश्ता है. यह एक ऐसा पकवान है जो घर-घर में बनता आ रहा है. और इसकी खूशबू के साथ ही कोई भी व्यक्ति इसका फैन हो जाता है. बिना स्वाद लिए रहा नहीं जाता. समय जैसे-जैसे आगे बढ़ा, गुझिया के बनाने के तरीके भी बदले. गुझिया में भरने वाली चीजें भी बदलीं लेकिन एक चीज जो नहीं बदली, वह है गुझिया की डिजाइन. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुझिया आखिर आई कहां से? क्या इसका नाता मुगलों से है या यह पूरी तरह भारतीय है? आइए, होली के बहाने गुझिया के दिलचस्प इतिहास और इसके सफर पर एक नजर डालते हैं.
पढिये गुझिया भारत की है या विदेशी ? Gujiya History

गुझिया का इतिहास काफी पुराना है. कई खाद्य इतिहासकार इसे प्राचीन भारतीय पकवानों से जोड़कर देखते हैं. भारत में मीठे पकवानों की परंपरा सदियों पुरानी है. प्राचीन ग्रंथों में अपूप और पुआ जैसे पकवानों का जिक्र मिलता है. गुझिया का शुरुआती रूप ‘शष्कुली’ माना जाता है. शष्कुली एक प्रकार की तली हुई मिठाई थी. इसमें मैदा और चीनी का इस्तेमाल होता था.
केटी अचाया की किताब इंडियन फूड: ए हिस्टोरिकल कम्पेनियन में भारतीय व्यंजनों के विकास पर काफी कुछ लिखा हुआ है. किताब के अनुसार गुझिया जैसे पकवानों के प्रमाण 13वीं शताब्दी के आसपास मिलते हैं. उस समय इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता था. मध्यकाल के दौरान इसमें भरावन की परंपरा शुरू हुई.

क्या मुगलों से है इसका कनेक्शन ?
अक्सर लोग गुझिया को मुगलों से जोड़कर देखते हैं. इसके पीछे एक बड़ा कारण समसा या समोसा है. समोसा मध्य एशिया से भारत आया था. मुगलों के दौर में समोसे के मीठे रूप भी प्रचलित हुए. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि गुझिया समोसे का ही एक मीठा अवतार है. तुर्की और मध्य एशिया में बकलावा जैसी मिठाइयां मशहूर थीं. वहां मैदे की परतों में सूखे मेवे भरने का रिवाज था.मुगल काल में खानपान में कई बदलाव आए. शाही रसोइयों में नए प्रयोग किए गए. मावा (खोया) और सूखे मेवों का इस्तेमाल बढ़ गया. गुझिया में मावा भरने की कला शायद इसी दौर में निखरी. हालांकि, गुझिया का आकार और बनाने का तरीका इसे समोसे से अलग बनाता है. इसे पूरी तरह मुगलई कहना गलत होगा. यह भारतीय और मध्य एशियाई पाक कला का एक सुंदर मिश्रण दिखाई देता है.

भारत में अलग-अलग नामों से इसकी पहचान
गुझिया भारत के अलग-अलग इलाकों में कई अलग-अलग नामों से जानी जाती है. उत्तर भारत में इसे गुझिया तो कहीं-कहीं पेड़किया कहते हैं. महाराष्ट्र में इसे करंजी कहा जाता है. दक्षिण भारत में इसे सोमास या कज्जीकायलू के नाम से जानते हैं. गुजरात में इसे घुघरा कहा जाता है. हर क्षेत्र में इसकी भरावन बदल जाती है.उत्तर भारत में इसमें मावा और सूजी भरी जाती है. महाराष्ट्र में नारियल और गुड़ का इस्तेमाल होता है. दक्षिण भारत में चने की दाल और नारियल भरा जाता है. नाम और स्वाद भले अलग हों, लेकिन इसकी आत्मा एक ही है. यह हर जगह खुशियां बांटने का काम करती है.

