History Hemkunt Sahib हेमकुंड साहिब यात्रा का इतिहास

History Hemkunt Sahib उत्तराखंड के चमोली में मौजूद हेमकुंड साहिब यात्रा 20 मई से शुरू होने जा रही है. प्रशासन ने यात्रा की तैयारी शुरू कर दी है. तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए भारतीय सेना यात्रा मार्ग से बर्फ हटाने में जुट गई है. गोबिंद सिंह की तपस्थली के रूप में पहचाना जाने वाला यह स्थल बर्फ से ढकी चोटियों से घिरा हुआ है.हेमकुंड साहिब यात्रा हर साल जून से अक्टूबर के बीच ही संभव होती है, क्योंकि बाकी समय यह क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है. यात्रा की शुरुआत गोविंदघाट से शुरू होती है. यहां से लगभग 19 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा कर श्रद्धालु हेमकुंड साहिब पहुंचते हैं. चमोली का जिला प्रशासन भी यात्रा मार्ग पर श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए अलर्ट मोड पर है. रास्ते में कैंप, मेडिकल सुविधाएं, सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन सिस्टम की निगरानी पर जोर दिया जा रहा है.

कब रवाना होगा पहला जत्था ? History Hemkunt Sahib


परंपरा के अनुसार पंज प्यारे की निगरानी में 20 मई को श्रद्धालुओं का पहला जत्था हेमकुंड साहिब के लिए रवाना होगा.  राज्य सरकार श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं के लिए पूरी तरह तैयार है. उन्होंने कहा, सरकार यात्रा की हर तरह से निगरानी कर रही है. यात्रा के दौरान भक्तों को होने वाली किसी भी परेशानी से निपटने के लिए सरकार हर संभव मदद करेगी.लगभग 4633 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हेमकुंड साहिब हेमकुंड झील के किनारे स्थित है. अधिक ऊंचाई और बर्फ के कारण, यह स्थान केवल गर्मियों में मई से अक्टूबर के बीच खुलता है. इस यात्रा के लिए ऋषिकेश-बद्रीनाथ हाईवे पर गोविंदघाट से होते हुए कठिन पैदल ट्रैकिंग करना पड़ता है.

1960 में भारतीय सेना के सहयोग से हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे का निर्माण किया गया.

हेमकुंड साहिब का उल्लेख सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह की आत्मकथा बिचित्र नाटक में मिलता है. इस किताब से पता चलता है कि उन्होंने इसी स्थान पर कठोर तपस्या की थी. इसी कारण यह स्थान सिख श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है.मान्यता है कि इस स्थान की पहचान 20वीं सदी में हुई. 1930 के दशक में संत सोहन सिंह और हवलदार मोहन सिंह ने इस स्थान की खोज की और इसे गुरु गोबिंद सिंह की तपस्थली के रूप में पहचान दी. लगभग 30 वर्ष के बाद 1960 में भारतीय सेना के सहयोग से हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे का निर्माण किया गया.

उत्तराखंड के चमोली जिले में, जहाँ हिमालय की विशाल चोटियाँ आकाश को छूती हुई प्रतीत होती हैं, वहीं 4,329 मीटर की ऊँचाई पर स्थित पवित्र हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा है। इस स्थान का नाम हेमकुंड झील से पड़ा है, जो इसके पवित्र परिसर के निकट स्थित है और जिसका निर्मल जल इसके नाम के सार को प्रतिबिंबित करता है – ‘बर्फ की झील’।यहाँ सिखों की आध्यात्मिक यात्रा अपने चरम पर पहुँचती है, क्योंकि हेमकुंड साहिब सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी को शाश्वत श्रद्धांजलि अर्पित करता है, जिन्होंने कभी इसी स्थान पर ध्यान किया था।

हेमकुंड साहिब विश्व का सर्वोच्च गुरुद्वारा है

उत्तम सफेद संगमरमर और कंक्रीट से निर्मित, एक आकर्षक तारा-आकार की संरचना में, यह गुरुद्वारा हेमकुंड के निर्मल जल के किनारे भव्यता से खड़ा है। इस 2 किलोमीटर लंबी हिमनदी झील की परिधि इसे घेरे हुए विशाल सप्तश्रृंग चोटियों को प्रतिबिंबित करती है, जिससे पूरे परिदृश्य में गहन शांति का माहौल छा जाता है।हेमकुंड साहिब अपनी प्राकृतिक और स्थापत्य कला की भव्यता के अलावा, हिंदू और सिख पौराणिक कथाओं की ताने-बाने में रची-बसी विभिन्न आस्थाओं के पवित्र संगम का प्रतीक है। मार्कंडेय पुराण जैसे पूजनीय हिंदू ग्रंथों के अनुसार, इन्हीं तटों पर महान ऋषि मेधसा और भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने तपस्या और ध्यान किया था। इस साझा विरासत के प्रति एक प्रतीकात्मक संकेत के रूप में, लक्ष्मण को समर्पित एक मंदिर इस पवित्र स्थल की आध्यात्मिक महत्ता का विनम्र साक्षी है। हेमकुंड साहिब विश्व का सर्वोच्च गुरुद्वारा है और एक शाश्वत प्रकाशस्तंभ है, जो विभिन्न धर्मों के भक्तों को अपनी दिव्य शरण में आकर्षित करता है।