Umananda Island शिवजी और मां सती के प्रेम का प्रतीक है उमानंद आइलैंड

Umananda Island असम की राजधानी गुवाहाटी के ब्रह्मपुत्र नदी के बीच उमानंद आइलैंड है, जो न सिर्फ अपनी खूबसूरती बल्कि धार्मिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। इस आइलैंड में उमानंद मंदिर है, जहां उमानंद बाबा की पूजा-अर्चना की जाती है, जो शिव भगवान के एक रूप माने जाते हैं। उमानंद मंदिर में जो भी भक्त दर्शन करने आते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इसी वजह से इस मंदिर में हर साल हजारों लोग दर्शन करने जाते हैं। खासकर शिवरात्रि के पर्व में हजारों भक्त मंदिर आते हैं। धार्मिक मान्यता के मुताबिक उमानंद द्वीप को भस्माचल भी कहा जाता है। इस नाम से जुड़ी एक पौराणिक कथा है।

असम के गुवाहाटी में ही मां कामाख्या का मंदिर है, जहां दर्शन करने आए भक्त शिव भगवान के इस मंदिर में भी दर्शन करने आते हैं। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इसी जगह पर भगवान शिव ने कामदेव का वध किया था। अब सवाल उठता है कि उमानंद मंदिर का इतिहास क्या है, साथ ही सवाल उठता है कि इसे भस्माचल क्यों कहा जाता है? धार्मिक कहानियों के मुताबिक उमानंद द्वीप शिवजी और मां सती के प्रेम का प्रतीक है। मां सती राजा दक्ष की बेटी थीं, जिन्हें शिवजी और सती जी का रिश्ता पसंद नहीं था। इसी वजह से मां सती ने राजा दक्ष से सारे रिश्ते तोड़ दिए और उमानंद द्वीप पर आकर रहने लगीं। सती जी और भगवान शिव ने कई सालों तक इसी जगह अपना जीवन बिताया था। इसी वजह से कई सालों बाद 1694 में यहां शिव जी का मंदिर बनाया गया।

भस्माचल नाम से जुड़ी पौराणिक कथा Umananda Island

पौराणिक कथाओं के मुताबिक एक बार राजा दक्ष ने पूजा समारोह रखवाया था, जिसमें मां सती को भी बुलाया था, जबकि भगवान शिव जी को नहीं बुलाया गया था। जिस वजह से सती जी दुखी हुईं और शिव जी से इच्छा जताई कि वह पूजा समारोह में जाएं। शिव जी ने सती की बात मान ली। जिसके बाद दोनों दक्ष के घर पहुंचे तो राजा दक्ष शिव भगवान को देख आगबबूला हो गए। पूरे समारोह में उन्होंने शिव जी और सतीजी का अपमान किया। जिसके बाद सती जी शिव भगवान का अपमान सह नहीं पाईं और आत्महत्या कर ली।

सती जी के बिछड़ने के बाद शिव भगवान बेहद दुखी रहने लगे थे। जिसे देख भगवान विष्णु जी ने कामदेव को उमानंद द्वीप भेजा। कामदेव उमानंद में आकर नृत्य करने लगे, ताकि शिव जी का मन शांत हो जाए। उसी वक्त भगवान शिव बेहद गुस्से में थे, तब उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया। जिसके बाद कामदेव का सुंदर स्वरूप हमेशा के लिए खत्म हो गया। इसी वजह से इस मंदिर को भस्माचल नाम से जाना जाता है।