Kainchi Dham उत्तराखंड के नैनीताल के पास स्थित विश्व प्रसिद्ध कैंची धाम जहाँ है दिव्य बाबा नीम करौली का आश्रम …. यहाँ हर साल 15 जून को भव्य स्थापना दिवस मेला आयोजित किया जाता है。 इस दिन बाबा के दर्शन और विशाल भंडारे के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं ,आश्रम परिसर में धार्मिक अनुष्ठान हो रहा है तो वहीँ बाबा नींब करौरी के जयकारों से समूचा माहौल भक्तिमय बना हुआ है। मंदिर तक पहुँचने वाली इन सड़कों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा का ध्यान करते हुए हवन, महाआरती के साथ देश, प्रदेश की सुख, शांति व समृद्धि को प्रार्थना करने के लिए कई किलोमीटर लम्बी लाइनों में लगे हुए दिव्य धाम के दर्शन को आतुर दिखाई दिए।

कैंची धाम की स्थापना दिवस पर पहुंचे हजारों बाबा भक्त कहीं आश्रम परिसर में जिम्मेदारी संभालते दीखते हैं तो कई भक्त हनुमान चालीसा पाठ में जुटे नजर आते हैं। आश्रम के समीप ध्यान केंद्र समेत कई स्थानों पर भक्त हनुमान चालीसा पाठ में मग्न है। बातचीत में भक्तों ने बताया की वो खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं की स्थापना दिवस पर यहां पहुंचे है। वहीं प्रशासन और सरकार की शानदार व्यवस्था पर अपनी ख़ुशी भी जाहिर करते दिखाई दिए –
बाबा नीब करौरी, जिन्हें लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से भी जाना जाता था, ने बाल्यकाल में वैराग्य अपनाया और बाद में गृहस्थ जीवन में लौटकर आध्यात्म व पारिवारिक दायित्वों के बीच संतुलन का संदेश दिया। उन्हें उनके चमत्कारों और आध्यात्मिक प्रभाव के कारण विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाना गया, जैसे तलैया बाबा, हांडी बाबा और चमत्कारी बाबा।

दुनियाभर में बाबा नीब करौरी के नाम से विख्यात लक्ष्मी नारायण शर्मा केवल एक नाम नहीं, बल्कि आध्यात्म, सेवा और त्याग की अद्भुत परंपरा के प्रतीक थे।
बाल्यकाल में ही वैराग्य का मार्ग अपनाकर ज्ञान की खोज में निकले महाराज जहां-जहां पहुंचे, वहां की परिस्थितियों और लोगों की श्रद्धा के अनुरूप उन्हें अलग-अलग नामों से जाना गया।दुनिया को अपने चमत्कारों और आध्यात्मिक शक्ति से प्रभावित करने वाले बाबा के जीवन का एक ऐसा पक्ष भी है, जिससे आज भी अनेक लोग अनभिज्ञ हैं। वह केवल उच्च कोटि के संत ही नहीं, बल्कि एक आदर्श गृहस्थ, पति और पिता भी थे।

बाबा ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि आध्यात्म और गृहस्थ जीवन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। महाराज का जन्म 30 नवंबर 1900 को फिरोजाबाद के समीप अकबरपुर गांव में हुआ था। उनका बाल्यकालीन नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उनके दादा पंडित ज्ञानचंद शर्मा वेदों के प्रकांड विद्वान एवं जमींदार थे, जबकि दादी सरस्वती देवी संस्कृत और शास्त्रों की विदुषी थीं। पिता पंडित दुर्गा प्रसाद शर्मा और माता कौशल्या देवी के स्नेह एवं संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को धार्मिक, करुणामय और आध्यात्मिक बनाया।

महाराज का विवाह मात्र 11 वर्ष की आयु में नौ वर्षीय रामबेटी देवी से हुआ था। किंतु किशोरावस्था में ही उनका मन आध्यात्म की ओर आकर्षित हो गया और लगभग 12–13 वर्ष की आयु में वे घर छोड़कर वैराग्य के मार्ग पर निकल पड़े।इसके बाद उन्होंने जहां-जहां अपने चमत्कारों और आध्यात्मिक प्रभाव से लोगों को प्रभावित किया, वहां लोग उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारने लगे। गुजराज के गोरबी गांव में जल के भीतर रहकर ध्यान लगाने के कारण उन्हें तलैया बाबा, नीब करौरी गांव में आगमन होने पर नीब करौरी, हांडी लेकर भिक्षा मांगने पर हांडी बाबा, चमत्कारों के चलते चमत्कारी बाबा, जबकि नैनीताल में उन्हें बाबा नीब करौरी व महाराज जैसे नामों से पहचान मिली। आज उनके इस सिद्ध धाम में आस्था और मान्यताओं का ये सैलाब बता रहा है कि देवभूमि को देवों और दिव्य शक्तियों की भूमि क्यों कहते हैं।

