Happy Birthday Major आज एक ऐसे जादूगर का जन्मदिन है जिसकी हुनर और प्रतिभा का दुनिया ने लोहा माना था। हिटलर हो या महाशक्ति अमेरिका या कोई भी मुल्क , सबने कहा ये खिलाड़ी नहीं कोई चमत्कार है। ध्यानचंद (Dhyan Chand) को ऐसे ही हॉकी का जादूगर नहीं कहा जाता. साल 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में उन्होंने देश को स्वर्ण पदक दिलाया. उनका प्रदर्शन ही उन्हें महान खिलाड़ी बनाता है.
Happy Birthday Major यूं ही कोई जादूगर खिलाड़ी नहीं बन जाता है

Happy Birthday Major भारत के खेलों के इतिहास में एक नाम बेहद खास है और वो है हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद (Major Dhyanchand) का. आज उनकी 116वीं जयंती है. देश उनकी जयंती पर राष्ट्रीय खेल दिवस भी मनाता है. एक ऐसा खिलाड़ी जिसकी शख्सियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अडॉल्फ हिटलर भी उनके खेल का कायल था. ध्यानचंद की खासियत मैदान पर गोलों की बारिश करना रहा है. ऐसे में खेल की दुनिया के सितारे की जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें हम यहां लेकर आए हैं.

Happy Birthday Major मेजर ध्यानचंद ((Dhyanchand) ) का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद ज़िले में 29 अगस्त साल 1905 में हुआ था. राजपूत परिवार में जन्में ध्यानचंद को देश में हॉकी के सबसे महान खिलाड़ी के रूप में माना जाता है. ध्यानचंद के पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी का हिस्सा थे. पिता के आर्मी में होने के चलते उनका ट्रांसफर होता रहा और ध्यानचंद छठवीं कक्षा तक ही पढ़ाई कर पाए. पिता आर्मी के लिए खेलते थे, यानि की ध्यानचंद के खून में हॉकी छुपी हुई थी, हालांकि शुरुआत में उनका हॉकी से खास लगाव नहीं था और वो इससे बचते थे. 16 साल की उम्र में आर्मी ज्वॉइन करने के बाद उन्हें हॉकी से ऐसा लगाव हुआ जिसने उन्हें देश का सबसे शानदार हॉकी का खिलाड़ी बना दिया.
Happy Birthday Major नाम के पीछे छिपा है रोचक किस्सा

Happy Birthday Major ध्यानचंद के नाम के पीछे भी बड़ा रोचक किस्सा है. दिन में वक्त न मिल पाने के चलते ध्यानचंद ने रात में प्रैक्टिस का वक्त चुना था, लेकिन बड़ी समस्या लाइट का न होना थी. ऐसे में वो चांद की रोशनी में प्रैक्टिस किया करते थे, जिसके बाद उनके दोस्तों ने उन्हें चंद बुलाना शुरू कर दिया,, जिसके बाद उनका नाम ध्यानचंद पड़ गया. उनकी हॉकी की शुरुआत आर्मी हॉकी या रेजिमेंट तक ही सीमित रही. 1922 से 26 के बीच वो उसके लिए ही हॉकी खेलते रहे. लेकिन किस्मत और मेहनत का गठजोड़ यहां रुकने वाला नहीं था.टीम न्यूजीलैंड के दौरे पर गई जिसमें से 18 मैचों में उन्हें जीत हासिल हुई, 2 मैच ड्रॉ हुए और महज़ एक मैच में टीम हारी. इस दौरान उनके हॉकी में उम्दा प्रदर्शन के चलते लांस नायक के तौर पर प्रमोशन भी मिला. ध्यानचंद ने अपने करियर में 400 से ज़्यादा गोल किए. सरकार ने 1956 में पद्मभूषण से सम्मानित किया. ये देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सममान है.
अपना पहला ओलंपिक, पहला मैच और छा गए

- Happy Birthday Major 1928 में अपने पहले ओलंपिक मैच में ही ध्याचंद ने वो कारनामा किया कि दुनिया की नज़रें इस खिलाड़ी पर टिकी रह गईं. इस पहले ही मैच में ध्यानचंद ने 3 गोल किए. इस ओलंपिक के दूसरे मैच में भले ही ध्यानचंद सिर्फ 1 गोल कर पाए लेकिन तीसरे मैच में उन्होंने डेनमार्क के खिलाफ 5 में से 3 गोल किए. नीदरलैंड में हुए इस ओलंपित में ध्यानचंद ने 5 मैच में सबसे ज़्यादा 14 गोल किए.1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारत ने फाइनल मैच जर्मनी से खेला. इस मैच को देखने 40 हज़ार दर्शकों में एडॉल्फ हिटलर भी पहुंचा. पहले हाफ में जब भारत सिर्फ 1 गोल कर सका तो ध्यानचंद ने कुछ ऐसा किया कि सब हैरत में पड़ गए. दूसरे हाफ में उन्होंने जूते उतार दिए और नंगे पांव हॉकी खेली. भारत ने इस मैच में जर्मनी को 8-1 से हराया. ध्यानचंद के खेल ने हिटलट को भी उनका फैन बना दिया और उसने उन्हें खाने पर बुलाकर जर्मनी से खेलने को कहा, लेकिन ध्यानचंद का दिल तो हिंदुस्तान में था।
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