Why do criminals flee to Nepal हाल के वर्षों में जब भी किसी बड़े अपराधी की तलाश शुरू हुई, जांच एजेंसियों के सामने एक नाम बार-बार आया है और वह है नेपाल. ललित उर्फ नेपाली, लॉरेंस बिश्नोई गैंग का शूटर जयप्रकाश, जोगिंदर उर्फ जोगा डॉन, अतीक अहमद का बेटा असद, सुनील बहादुर और मनोज साहनी उर्फ टमाटर जैसे कई नाम ऐसे हैं, जिनके नेपाल भागने या वहां पनाह लेने की खबरें सामने आईं. इन सभी मामलों में एक समान बात यह रही कि अपराध करने के बाद या गिरफ्तारी से बचने के लिए नेपाल को सुरक्षित ठिकाने के तौर पर देखा गया.

भारत की सुरक्षा एजेंसियों का भी मानना रहा है कि लंबे समय से नेपाल कई भारतीय अपराधियों के लिए छिपने की सुविधाजनक जगह बना हुआ है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दोनों देशों के बीच लोगों की आसान आवाजाही है.भारत और नेपाल के बीच लोगों के आवागमन पर कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं जैसी सख्ती नहीं है. यही कारण है कि अपराधी अक्सर इस व्यवस्था का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. सीमा पार करने के बाद वे अपनी पहचान बदलने या छिपाने में अपेक्षाकृत आसानी महसूस करते हैं.कई मामलों में देखा गया है कि अपराधी भारत में वारदात करने के बाद नेपाल पहुंच जाते हैं और वहां कुछ समय तक खुद को कानून की पहुंच से दूर रखने की कोशिश करते हैं. जांच एजेंसियों के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन जाती है.
बिहार सीमा बनती है भागने का प्रमुख रास्ता
नेपाल की लंबी सीमा बिहार से जुड़ती है. इसी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर बिहार के कई वांछित अपराधी पड़ोसी देश में पहुंचने में सफल रहे हैं. बिहार पुलिस की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल कई बदमाशों के बारे में पहले भी जानकारी सामने आई है कि उन्होंने नेपाल में शरण ली थी.कई अपराधी वहां पहुंचने के बाद खुद को कारोबारी, निवेशक या सामान्य नागरिक के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं. चूंकि उनके खिलाफ नेपाल में कोई मामला दर्ज नहीं होता, इसलिए वे सामान्य जीवन जीते हुए भी भारतीय एजेंसियों की नजरों से दूर रहने का प्रयास करते हैं.बिहार पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी पहले बता चुके हैं कि नेपाल में कार्रवाई करना भारतीय एजेंसियों के लिए आसान नहीं होता. यदि पुलिस टीम वहां जाती भी है तो उसके सामने कई तरह की सीमाएं होती हैं.

सबसे बड़ी परेशानी यह है कि भारतीय पुलिस नेपाल में अपने हथियारों के साथ ऑपरेशन नहीं कर सकती. इसके अलावा तकनीकी निगरानी भी मुश्किल हो जाती है क्योंकि दोनों देशों के मोबाइल नेटवर्क और दूरसंचार व्यवस्था अलग-अलग हैं. ऐसे में अपराधियों की लोकेशन और गतिविधियों पर नजर रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. अधिकारी के अनुसार नेपाल में कुछ ऐसे इलाके भी हैं जहां स्थानीय स्तर पर पहुंचना आसान नहीं माना जाता. यही वजह है कि कई बार वांछित अपराधियों तक पहुंचने में लंबा समय लग जाता है.
आखिर अपराधियों को नेपाल ही क्यों भाता है ?
नेपाल तक पहुंचना अपेक्षाकृत सरल होने के कारण अपराधियों को लगता है कि वे वहां जल्दी सुरक्षित हो सकते हैं. एक बार सीमा पार कर लेने के बाद भारतीय एजेंसियों के लिए उन्हें गिरफ्तार करना और भारत वापस लाना लंबी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है. इसी कारण अपराधियों के बीच यह धारणा बनी रहती है कि नेपाल पहुंचने के बाद गिरफ्तारी की आशंका कम हो जाती है. कई गैंग और संगठित अपराध से जुड़े लोग इसी सोच के साथ नेपाल की ओर रुख करते हैं.

प्रत्यर्पण की प्रक्रिया बनती है सबसे बड़ी बाधा
भारत और नेपाल के बीच अपराधियों के प्रत्यर्पण यानी उन्हें वापस भारत लाने की प्रक्रिया कई कानूनी चरणों से गुजरती है. यही वजह है कि किसी वांछित आरोपी को वापस लाना हमेशा आसान नहीं होता. जांच एजेंसियों का अनुभव रहा है कि कई बार यह प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है. कानूनी दस्तावेज जुटाने, विभिन्न एजेंसियों के समन्वय और औपचारिक मंजूरियों में काफी समय लग सकता है. इस देरी का फायदा भगोड़े अपराधी उठाने की कोशिश करते हैं.
भारत-नेपाल सीमा कितनी लंबी है?
भारत और नेपाल के बीच कुल 1,751 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद है. यह सीमा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम समेत पांच भारतीय राज्यों से होकर गुजरती है. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश की सीमा नेपाल के साथ सबसे अधिक 651 किलोमीटर लंबी है. दूसरी ओर पश्चिम बंगाल नेपाल के साथ सबसे छोटी, 96 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है. सीमा क्षेत्र में 12 प्रमुख चेक पोस्ट स्थापित हैं. इसके अलावा अंतर-जिला सीमा पर 14 अन्य चेक पोस्ट भी मौजूद हैं.उत्तर प्रदेश के सुनौली और रुपैडिहा में एकीकृत चेक पोस्ट यानी आईसीपी भी संचालित हैं, जिनका उपयोग सीमा पार व्यापार और लोगों की आवाजाही को व्यवस्थित करने के लिए किया जाता है.

