Kanyakumari Amman Temple हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के चक्र से सती के अंग जहां.जहां पर कट कर गिरे, वे सभी स्थान शक्तिपीठ में स्थापित हो गये. भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित कुमारी अम्मन या फिर कहें कन्या कुमारी का मंदिर भी एक ऐसा शक्तिपीठ है, जिसकी महिमा का वर्णन पौराणिक काल से होता चला आ रहा है. देवी कन्या कुमारी के प्राकट्य की कथा और उनकी पूजा का महत्व जानने के लिए पढ़ें ये लेख

दक्षिण भारत आखिरी छोर तमिलनाडु में स्थित कन्या कुमारी एक ऐसा पावन शक्तिपीठ है जो तीन बड़े समुद्र – हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है. माता के इस मंदिर को कन्या तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है, जबकि स्थानीय लोग उन्हें कुमारी अम्मन और भगवती अम्मन के रूप में पूजते हैं. देवी कन्या कुमारी का यह पावन धाम देश के 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. मान्यता है कि कभी इसी पावन स्थान पर सती का पृष्ठभाग गिरा था. बहरहाल, पौराणिक मान्यता के अनुसार कन्या कुमारी का प्राकट्य कब और कैसे हुआ? शक्ति के इस दिव्य धाम का क्या धार्मिक महत्व है, आइए इसे विस्तार से जानते हैं.

देवी कन्याकुमारी की पौराणिक कथा Kanyakumari Amman Temple
हिंदू मान्यता के अनुसार पौराणिक काल में बाणासुर नाम के राक्षस ने कठिन तपस्या करके देवों के देव महादेव को प्रसन्न कर लिया. भगवान शिव ने उससे वरदान मांगने को कहा. इसके बाद बाणासुर ने भगवान शिव से अपनी मृत्यु कुंआरी कन्या के अलावा किसी दूसरे से न होने वरदान प्राप्त कर लिया. भगवान शिव के इस वरदान को पाने के बाद बाणासुर ने तीनों लोगों में उत्पात मचा दिया.

इसके बाद सभी देवतागण श्री हरि के पास मदद मांगने के लिए गये. तब भगवान विष्णु ने उन्हें यज्ञ करने को कहा. मान्यता है कि देवताओं द्वारा किए गये यज्ञ की अग्नि से देवी दुर्गा का एक अंश कुंवारी कन्या के रूप में प्रकट हुआ. मान्यता है कि देवी कन्या कुमारी ने भगवान शिव से विवाह की कामना करते हुए कठिन तप किया, जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें वरण करने के लिए हामी भर दी. जब यह बात देवताओं को पता चली तो चिंतित हो गए क्योंकि बाणासुर का वध कुमारी कन्या ही कर सकती थी. इसके बाद देवताओं ने अपनी चिंता देवर्षि नारद से कही तो उन्होंने इसकी युक्ति निकालने का आश्वासन दिया.
मान्यता है कि जब महादेव कुवारी कन्या से विवाह के लिए जाने लगे तो देवर्षि नारद ने उन्हें तब तक रोके रखा जब तक उनके विवाह का शुभ मुहूर्त निकल नहीं गया. विवाह का मुहूर्त निकल जाने के बाद विवाह की सारी सामग्री समुद्र में फेंक दी गई. मान्यता यह भी है कि देवी ने क्रोधित होकर सारी भोजन एवं अन्य सामग्री को रेत और सीपियों में बदल जाने का श्राप दे दिया था.

भगवान शिव से विवाह न हो पाने के बाद देवी कन्या कुमारी एक बार फिर अपनी तपस्या में लीन हो गईं. मान्यता है कि देवी के तप और सौंदर्य की प्रसिद्धि जब बाणासुर के कानों तक पहुंची तो वह उनके पास पहुंच गया और उनसे विवाह करने के लिए हठ करने लगा. जब बाणासुर देवी कन्याकुमारी को हठपूर्वक अपने साथ ले जाने का प्रयास करने लगा तो देवी क्रोधित हो गईं. इसके बाद बाणासुर और कन्याकुमारी के बीच भयंकर युद्ध हुआ. जिसके अंत में देवी कन्याकुमारी ने बाणासुर का वध किया. बाणासुर के वध से देवताओं को भले मुक्ति मिल गई लेकिन महादेव के इंतजार करने वाली देवी कन्या कुमारी आजीवन कुंवारी ही रह गईं.
कन्या कुमारी का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी कन्याकुमारी की मूर्ति की स्थापना भगवान परशुराम ने की थी. हिंदू मान्यता के अनुसार देवी कलयुग के अंत तक पृथ्वी पर वास करेंगी. देवी दुर्गा का अंश मानी जाने वाली कन्या कुमारी के बारे में मान्यता है कि यहां स्नान करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है और उस पर भगवती अम्मन की हर समय कृपा बनी रहती है.

