Uttarakhand School कमलेश अटवाल उत्तराखंड के मिलक नजीर गांव के रहने वाले हैं। उन्हें इस बात का एहसास होता था कि उनके गांव के बच्चे अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाने और सही करियर चुनने के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। वह उनकी मदद करना चाहते थे। यही सोचकर कमलेश ने 2012 में नानकमत्ता गांव में स्कूल खोलने का फैसला किया। तब वह दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहे थे। उनका लक्ष्य ऐसा माहौल बनाना था जहां छात्र और शिक्षक बेहतर भविष्य के लिए प्रयास करते हुए सीखने और सिखाने में सहयोग करें। इस स्कूल में बच्चे ही करिकुलम को प्लान करते हैं। वे खुद तय करते हैं कि क्या पढ़ना है।
मीडिया की सुर्खियां बनी शिक्षक कमलेश की कहानी
Uttarakhand School

2012 से 2014 तक स्कूल के काम के लिए कमलेश छुट्टियों में या छुट्टी लेकर नानकमत्ता आते थे। एक बार जब उन्होंने 2015 में अपनी पीएचडी पूरी कर ली तो शिक्षक बनने के अपने सपने को संजोने और स्कूल को नए तरीके से फिर से डिजाइन करने के लिए वह गांव आ गए। आज वह सिर्फ शिक्षक नहीं हैं, बल्कि छात्रों के साथ-साथ खुद भी सीखते हैं। उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के छात्रों ने अलग-अलग क्षेत्रों में 20 से ज्यादा सामुदायिक केंद्र स्थापित किए हैं। इनका फोकस उन छात्रों को सीखने की जगह प्रदान करना है जो शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते।
ऐक्टिविटीज को किया जाता है प्रमोट
इन सेंटरों में छात्र पुस्तक और विज्ञान मेलों का आयोजन करते हैं। खेल, संगीत, फिल्मों और किताबों के जरिये शिक्षण और प्रबंधन के बारे में सीखते हैं। स्कूल में 1,000 से ज्यादा छात्र हैं। इन प्रोजेक्टों में ज्यादातर 9 से 12वीं तक के सीनियर स्टूडेंट होते हैं। कमलेश का लक्ष्य ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण बच्चों को समग्र शिक्षा प्रदान करना है। यह एक स्टूडेंट लीडरशिप वाला स्कूल है जहां छात्र ढेर सारी गतिविधियों के माध्यम से एक-दूसरे से सीखते हैं। स्कूल का करिकुलम फ्लेक्सिबल है। यह गांवों और अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को आकर्षित करता है। वो यहां समय बिताना पसंद करते हैं।
फील्ड रिसर्च पर फोकस
कमलेश को कम्युनिटी सेंटर का आइडिया पिथौरागढ़ जिले के एक्टिविस्ट महेश चंद्र पुनेठा ने दिया था। शुरू में फोकस सिर्फ किताबें उपलब्ध कराने पर था। लेकिन, बाद में यह एक ऐसे स्थान के रूप में विकसित हुआ जहां समुदाय के बच्चे एक-दूसरे से सीख सकते थे। एनपीएस छात्रों को फील्ड रिसर्च करके फिल्म बनाने के लिए स्थान भी देता है। अब तक स्कूल ने छात्रों को अपने यूट्यूब चैनल पर दो डॉक्यूमेंट्री रिलीज करने में मदद की है।
स्थानीय परिवेश में सिखाने की होती है कोशिश
स्कूल की कोशिश होती है कि छात्र स्थानीय परिवेश में सीखें। कमलेश महसूस करते हैं कि बच्चे जब इस तरह से सीखते हैं तो उनके लिए चीजों को जानना-समझना आसान हो जाता है। वे खुद को चीजों से कनेक्ट कर लेते हैं। जो चीजें क्लास की सेटिंग में सिखाई जाती हैं वो बहुत क्लासिकल होती हैं। उससे स्टूडेंट पारंपरिक कला, चुनौतियों, सामाजिक मुद्दों और रीति-रिवाजों पर फोकस नहीं कर पाते हैं।
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