हिंदू धर्म में नंदी महाराज को कैलाश का द्वारपाल भी बताया जाता है, जो शिव के वाहन और अवतार दोनों हैं। शैव परंपरा में नंदी को शक्ति संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है। अगर आप शिव मंदिर जाते हैं तो आपने एक बात गौर की होगी कि, भगवान शिव के मंदिर में जाने से पहले बाहर उनके प्रिय नंदी देव जी विराजमान रहते हैं।
भक्त भगवान शिव के साथ नंदी महाराज की भी पूजा करते हैं। शिवजी के ज्यादातर मंदिरों में नंदी महाराज की मूर्ति को हमेशा एक पैर आगे और दूसरा मुड़ा हुआ दिखाया जाता है। आपने कभी सोचा है इसके पीछे क्या गहरा रहस्य छिपा है। आइए जानते हैं इसके बारे में।
सनातन धर्म में नंदी सिर्फ एक पवित्र बैल ही नहीं, बल्कि धर्म, भक्ति, अनुशासन और दृढ़ विश्वास का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी वजह से प्रत्येक शिव मंदिर में नंदी को सीधे भोलेनाथ के सामने स्थापित किया जाता है।
धर्म के 4 स्तंभ क्या है?
प्राचीन शास्त्रों में धर्म का चार स्तंभों पर टिका हुआ बताया गया है। जिसमें धर्म, करुणा, संयम और सत्य शामिल है। जब ये चारों मजबूत रहते हैं, तो समाज फलता-फूलता है। ऐसे में नंदी की मुद्रा हमारे आज के युग को दर्शाती है।
एक पैर फैला हुआ रहता है और तीन मुड़े रहते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि, कलियुग में केवल एक चौथाई धर्म ही सक्रिय रहता है। फिर भी धर्म अभी भी जीवत है।
कई परंपराओं में बताया गया है कि, कलियुग में सत्य सबसे मजबूत स्तंभों में से एक है। जब कन्फ्यूजन फैलता है, तब भी सत्य सच्चे भक्तों को रास्ता दिखाने का काम करता है। यही वजह है कि, आज ईमानदारी को सबसे महान आध्यात्मिक अभ्यासों में से एक माना जाता है।
प्रत्येक शिव मंदिर में छिपा सबक
हर भक्त शिव तक पहुंचने से पहले नंदी के पास से गुजरते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि, ईश्वर को खोजने से पहले व्यक्ति को सच, करुणा, शांति और आत्म संयम के बारे में सीखना चाहिए। नंदी हमें इस मार्ग की याद दिलाते हैं।
शिव मंदिर में आने वाले भक्त नंदी के कान में धीरे से अपनी प्रार्थना कहते हैं। मान्यता है कि, नंदी शिव के सबसे परम भक्तों में शामिल हैं और सच्चे मन से की गई प्रार्थनाओं को महादेव तक पहुंचाने का काम करते हैं।
कलियुग के लिए नंदी का संदेश
कलियुग में धर्म पूरी तरह लुप्त नहीं होगा। उनका बढ़ा हुआ पैर इस बात का प्रतीक है कि, सत्य, दयालुता और सच्ची प्रार्थन ये आज भी दुनिया में धर्म को मजबूत बनाए रखे हैं।

