Lathmar Holi Barsana : आओ मुझको रंग लगाओ – मैं गोरी हूँ बरसाने की , 1 Great Festival

Lathmar Holi Barsana होली करीब है लेकिन मथुरा की गलियों में रंगों की उमंग शुरू हो चुका है। आज बात कान्हा की नगरी की करेंगे जहां बरसाना की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली (Lathmar Holi) को लेकर काफी हर्षोल्लास का माहौल नजर आ रहा है। वैसे तो बसंत पंचमी (Basant Panchami) से ही 40 दिवसीय होली (Holi) की धूम शुरू है लेकिन ये जोश अब बढ़ता जा रहा है।

 

Lathmar Holi Barsana बरसाना की लट्ठमार होली का अनोखा है उल्लास

Lathmar Holi Barsana
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  • Lathmar Holi Barsana विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली (Lathmar Holi) को लेकर बरसाना (Barsana) के सभी प्रतिष्ठानों के दुकान स्वामियों (Shopkeeper) में काफी हर्षोल्लास का माहौल नजर आ रहा है। वैसे तो बसंत पंचमी (Basant Panchami) से ही 40 दिवसीय होली (Holi) की धूम शुरू हो जाती है, जबकि दुकानदार (Shopkeeper) का कहना है कि 40 दिन पहले से ही प्रतिष्ठानों पर ऑर्डर लगने शुरू हो जाते हैं और हम लोग 40 दिन के अंदर करीब 250 से 300 पारंपरिक परिधान तैयार कर देते हैं जो कि होली (Holi) तक हम लोगों का इसी प्रकार से कार्य चलता रहता है।
Lathmar Holi Barsana
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Lathmar Holi Barsana धोती कुर्ता  पगड़ी भी की जाती है तैयार

  • Lathmar Holi Barsana स्थानीय होलियारे बताते हैं कि पारंपरिक परिधानों में धोती कुर्ता बगल बंदी सिर की पगड़ी भी तैयार की जाती हैं। लठमार होली वाले दिन स्वयं श्याम श्यामा जी होली खेलने के लिए जब तैयार होती हैं तो तरह-तरह की पोशाक बदली जाती हैं, जिसमें कई रंग और गुलाल भी डाल जाता है तो दूसरी ड्रेस धारण की जाती है।


Lathmar Holi Barsana सूरत से मंगाया जाता है राधा रानी की पोशाक का कपड़ा

  • Lathmar Holi Barsana दुकानदारों का भी जोश देखते बनता है जो राधा रानी की पोशाक तैयार करने के लिए कपड़ा सूरत से मंगाते हैं। करीब 2 दिन में एक पोशाक तैयार हो पाती है, जिसमें वो अपनी तैयारियां बसंत पंचमी से ही शुरू कर देते हैं। वहीं राधा रानी मंदिर सेवायत ने जानकारी देते हुए बताया कि परंपरा है जो वेशभूषा है वह धोती कुर्ता बगल बंदी और पगड़ी है, जिसको हर होली पर नए-नए बनवा कर के होली खेलने के लिए धारण करते हैं।


Lathmar Holi Barsana होली पर पारंपरिक परिधानों का होता है विशेष महत्व

Lathmar Holi Barsana दुकानदारों ने बताया कि होली पर परिधानों का विशेष महत्व होता है। जैसे हम धारण करते हैं हमारे श्याम श्यामा जुगल सरकार भी बगल बंदी जामा हमारे सनातन धर्म में जो पूजा का अधिकार होता है। जब पूजा करते हैं तो ऐसा वस्त्र धारण करते हैं कि दोनों बाजुओं में होकर पहना जाता है

लट्ठमार होली का इतिहास और महत्व

  • द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने कई लीलाएं की हैं. बाल्यकाल में राधा और गोपियों के साथ श्रीकृष्ण की लीलाएं प्रसिद्ध हैं. कहा जाता है कि बाल श्रीकृष्ण जब बरसाना में राधाजी और गोपियों के संग होली खेलते थे, तो उनको तंग भी किया करते थे. राधाजी और गोपियां भगवान श्रीकृष्ण और ग्वालों को डंडा लेकर दौड़ाती थीं. श्रीकृष्ण के प्रेम में सराबोर रा​धाजी और गोपियां उनका रंग गुलाल और डंडों से स्वागत करती थीं. तब से यह परंपरा चली आ रही है.

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