देहरादून से अनीता तिवारी की रिपोर्ट

Temples of Uttarakhand यहाँ कदम कदम पर देवताओं का वास है , मायूस और निराश श्रद्धालुओं के लिए उम्मीद और आस है ….. ये पर्वतों से घिरी वादियां है जहाँ देवियों और देवों का निवास है … आज हम आपको उत्तराखंड के इन्हीं मान्यताओं से जुड़े ख़ास मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी अपनी अहमियत ख़ास है।
Temples of Uttarakhand देवस्थान से शक्तिपीठ तक की लम्बी है शृंखला

तारकेश्वर महादेव मंदिर:
- Temples of Uttarakhand पौड़ी गढ़वाल का तारकेश्वर महादेव मंदिर भगवान् शिव के लिए समर्पित है ‘गढ़वाल राइफल’ के मुख्यालय लांसडाउन से इस प्रसिद्ध मंदिर की दूरी 36 किलोमीटर है। चीड़ व देवदार के जंगलों से घिरा यह दर्शनीय स्थान उन लोगों के लिए आदर्श है जो प्रकृति में सुन्तरया को तलाशने का जज्बा रखते हैं। शिवरात्रि के दौरान इस मंदिर में भगवान् शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है साथ ही यहाँ आवास के लिए एक धर्मशाला की सुविधा भी है।

श्री कोटेश्वर महादेव मंदिर
- Temples of Uttarakhand श्री कोटेश्वर महादेव मंदिर भी शिव भगवान्ए का मंदिर है इसका शिवलिंग हिमालय पर्वतमाला, पश्चिम में हरिद्वार और दक्षिण में सिद्ध पीठ मेदानपुरी देवी मंदिर से घिरा है, ये मंदिर 1428 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, साथ ही ये बैऔलाद (जिनकी कोई संतान नहीं होती) जोड़ों के बीच अत्यंत मान्य है, इसके बारे में ये कहा जाता है की खुदाई के दौरान इस मंदिर के शिवलिंग पर महिला ने अनजाने में चोट मार दी और इसके पश्चात् शिव लिंग में से दिव्य आवाज आई। दिव्य आवाज सुनने के बाद लोगों ने यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित किया, और इस मंदिर का निर्माण हुआ यहाँ के लोगों की श्रद्धा है कि श्रावण के पूरे महीने पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ महामृत्युंजय मंत्र का पालन करने वाले बैऔलाद जोड़ों पर भगवान शिव की कृपा होती है।

धारी देवी मंदिर:
- Temples of Uttarakhand धारी देवी मंदिर माँ काली का प्रसिद्ध मंदिर है जो पौड़ी गढ़वाल में स्थित है, यहाँ के बारे में लोगों का कहना है की इस मंदिर में स्थापित मां काली की मूर्ति बाढ़ में बैठकर दारू गांव के पास आयी, और साथ ही लोगों की ये मान्यता है की इस मंदिर में स्थापित काली माँ की मूर्ति दिन में तीन बार अपना रुख बदलती है। सर्वप्रथम मूर्ति एक कन्या का रूप, इसके बाद महिला का रूप और अंत में वृद्ध महिला का रूप धारण करती है। माँ काली का यह मंदिर दिल्ली-राष्ट्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग 55 पर श्रीनगर से 15 km दूर है । यह मंदिर जल के बीचों-बीच स्थित है अलकनंदा नदी के किनारे पर मंदिर के निकट तक 1 किमी-सीमेंट से बना हुआ मार्ग जाता है। मंदिर के पास एक प्राचीन गुफा भी मौजूद है।

नीलकंठ महादेव मंदिर:
- Temples of Uttarakhand नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश से 32 कि.मी. दूर स्थित है, ये मंदिर पौराणिक महत्व और खूबसूरत परिवेश का संगम है, कहा जाता है की इस जगह में भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष का सेवन किया था, जिसे पीने के उपरांत भगवान शिव का गला नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना जाने लगा। सिंचाई और वन विभाग के विश्राम गृह यहाँ पर उपलब्ध है।

Temples of Uttarakhand माँ ज्वाल्पा देवी मंदिर:
माँ ज्वाल्पा देवी मंदिर देवी दुर्गा के लिए समर्पित है मंदिर पौड़ी-कोटद्वार मोटर सड़क पर पौड़ी से लगभग 33 km दूर है , नवरात्र के दौरान दूर से से लोग यहाँ अपनी मन्नत लेकर आते हैं। नवरात्र में यहाँ माँ दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है ये मंदिर नदी नायर नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है
कंकालेश्वर मंदिर:
पौड़ी गढ़वाल के इस मंदिर में भगवान शिव, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की मूर्ति को स्थापित है, यह पहाड़ों की ऊंची चोटी पर स्थित 8वीं शताब्दी का मंदिर है। इस मंदिर के आस पास का नजारा बहुत ही सुन्दर लगता है जो एक पर्यटक को आकर्षित करने के लिए काफी है।

कंडोलिया / डांडा नागराजा मंदिर:
Temples of Uttarakhand कंडोलिया मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर कंडोलिया मार्केट एवं कंडोलिया पार्क के कारण अधिक प्रसिद्ध है क्योंकि अक्सर जो लोग भी कंडोलिया मार्केट या पार्क जाते हैं वे इस मंदिर के दर्शन अवश्य आते हैं, इस मंदिर के इर्द -गिर्द बांज बुरांश के पौधे वाला जंगल हैं।डांडा नागराजा मंदिर पौड़ी जिले में स्थित भगवान विष्णु के अवतार के लिए जाना जाने वाला एक प्रमुख मंदिर है। यह मंदिर एवं इस मंदिर के आसपास का दृश्य काफी सुंदर दिखता है।

बिनसर महादेव मंदिर:
Temples of Uttarakhand यह मंदिर रानीखेत से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, यह मंदिर 10 वीं शताब्दी का है, मंदिर में विशेष रूप से भगवान हर गौरी, गणेश और महेशमर्दिनी की स्थापित प्रतिमा प्रमुख है। पहाड़ी पर स्थित देवदार एवं अन्य प्रकार के वृक्ष इस मंदिर की शोभा बढ़ाते हैं महाराजा पृथ्वी को इस मंदिर बनाने के श्रेय दिया जाता है..
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