Somnath Mandir देश में कभी भी ज्योतिर्लिंग का जिक्र होता है तो सबसे पहला नाम सोमनाथ मंदिर का आता है. गुजरात के वेरावल के पास प्रभास पाटन में समंदर किनारे खड़ा यह मंदिर देश की धन-धान्य और आस्था का प्रतीक है. सोमनाथ मंदिर को महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक कई मुस्लिम आक्रांताओं ने बार-बार निशाना बनाया, लेकिन भगवान शिव का यह मंदिर आज भी भारत का समृद्ध इतिहास और आस्था की अटूट शक्ति का प्रतीक बनकर खड़ा है.
सोमनाथ मंदिर के बारे में Somnath Mandir

सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है बल्कि भारतीय सभ्यता की आस्था, सहनशीलता व पुनर्जागरण का प्रतीक है। बार-बार ध्वंस और पुनर्निर्माण के बावजूद इसके अस्तित्व ने इसे ‘शाश्वत तीर्थ’ का दर्जा दिलाया है।
सोमनाथ मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रभास पाटन में वेरावल के निकट अरब सागर के तट पर कपिला, हिरण एवं सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम पर अवस्थित है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्राचीन काल: शिव पुराण, अन्य धार्मिक ग्रंथों और शिलालेखों से संकेत मिलता है कि यह स्थल प्राचीन काल से ही पूजा का केंद्र रहा है।
1026 ईस्वी: गजनी के महमूद द्वारा मंदिर पर आक्रमण कर इसे लूटा और ध्वस्त किया गया, जिसे भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण दुखद घटना माना जाता है।
मध्यकालीन युग: 12वीं सदी में कुमारपाल जैसे शासकों और चूड़ासमा राजवंश द्वारा मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया, किंतु सल्तनत काल में इसे पुनः नष्ट किया गया।
निरंतर विनाश और पुनर्निर्माण: ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि सोमनाथ मंदिर को लगभग छह बार ध्वस्त किया गया और हर बार इसे पुनः खड़ा किया गया, जो इसकी अद्भुत जीवटता को दर्शाता है।

वास्तुकला की विशेषताएँ
मंदिर का निर्माण चालुक्य (सोलंकी) स्थापत्य शैली में किया गया है। इसमें ऊँचा शिखर, पत्थर की सूक्ष्म नक्काशी और ज्योतिर्लिंग युक्त भव्य गर्भगृह स्थित है। एक प्रसिद्ध शिलालेख के अनुसार मंदिर के दक्षिणी तट से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक कोई भी भूभाग नहीं है जो इसके ब्रह्मांडीय संरेखण का प्रतीक माना जाता है।

आधुनिक पुनर्निर्माण
स्वतंत्रता के बाद (1947–1951): सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक कर्तव्य मानते हुए पुनर्निर्माण की पहल की।
प्रसिद्ध वास्तुकार प्रभाशंकर सोमपुरा ने पारंपरिक स्थापत्य विधियों के अनुसार मंदिर का निर्माण किया।
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई, 1951 को मंदिर का उद्घाटन किया।
वर्तमान समय में मंदिर की देखरेख सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा की जाती है जिसके अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री है।

