Kedarnath Rawal केदारनाथ धाम को 325वां रावल मिलने वाला है. महाशिवरात्रि के दिन 325वे रावल पदभार ग्रहण करेंगे. वर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग ने स्वास्थ्यगत कारणओं से पद त्यागने की घोषणा की है. अब रावल का दायित्व उन्होंने अपने शिष्य को सौंप दिया है. शिवाचार्य शांतिलिंग (केदार लिंग) केदारनाथ धाम के नए रावल होंगे. परंपरा अनुसार ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में पदभार ग्रहण होगा.महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर 325वें रावल की घोषणा को लेकर श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों में विशेष उत्साह है.आगामी चारधाम यात्रा और केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले यह निर्णय धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,रावल केवल पुजारी नहीं बल्कि धाम की आध्यात्मिक परंपरा के जीवंत प्रतीक होते हैं.ऐसे में यह परिवर्तन केदारनाथ धाम के इतिहास में एक नई कड़ी जोड़ने जा रहा है.

इसी अवसर पर पंचांग गणना के आधार पर श्री केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि और समय भी घोषित होगा. कार्यक्रम में पंचगाईं के हक-हकूकधारी और दस्तूरधारी ग्रामीण भी उपस्थित रहेंगे. श्री केदारनाथ धाम के कपाट बंद होने के बाद वीरशैव (जंगम) सम्प्रदाय के पांच पीठों के पंचाचार्यों द्वारा सर्वसम्मति से समर्थन प्रदान कर 325वें केदार जगद्गुरु के रूप में शिवाचार्य लिंग का भव्य पट्टाभिषेक समारोह आयोजित किया जाएगा. विधिवत अनुष्ठानों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच वे केदारपीठ के जगद्गुरु सिंहासन पर बैठेंगे.

बता दें कि केदारनाथ धाम में रावल सर्वोच्च पद होता है. रावल अविवाहित होते हैं. इनका संबंध कर्नाटक के वीरशैव संप्रदाय से होता है. कपाट खुलने और बंद होने के समय उनकी उपस्थिति अनिवार्य होती है. कपाट खुलने की तिथि तय करने से लेकर पुजारियों को अचकन-पगड़ी पहनाने, 6 महीने की पूजा का संकल्प दिलाने और पंचकेदार गद्दीस्थल से डोली को धाम के लिए विदा करने की परंपरा रावल ही निभाते हैं.
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने की थी रावल परंपरा की शुरुआत
केदारनाथ धाम में रावल (मुख्य पुजारी) परंपरा की शुरुआत 8वीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी ने की थी. उन्होंने दक्षिण भारत से कर्नाटक के वीरशैव (जंगम) संप्रदाय के विद्वानों को मंदिर की पूजा-अर्चना के लिए नियुक्त किया, जो परंपरा आज भी जारी है. इसी तरह बद्रीनाथ धाम के रावल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं. वर्तमान में बद्री-केदार मंदिर समिति रावल की नियुक्ति करती है, लेकिन इस परंपरा की नींव जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने ही रखी थी.

