Purnagiri Mandir पूर्णागिरी मंदिर जहाँ गिरी माता सती की नाभि

Purnagiri Mandir मां पूर्णागिरि मेले के दूसरे दिन श्रद्धालुओं  ने सुबह से शाम तक दर्शन पूजन किया। शुक्रवार को सीएम पुष्कर सिंह धामी ने ठुलीगाड़ में मेले का शुभारंभ किया था। पूर्णागिरि मंदिर समिति ने बताया कि पहले दिन आठ हजार श्रद्धालुओं ने मां के दर्शन किए, जबकि दूसरे दिन शनिवार को नौ हजार के करीब श्रद्धालु पूर्णागिरि धाम पहुंचे।मेला शुरू होने के बाद पूर्णागिरि धाम और यात्रा मार्ग का वातावरण आध्यात्मिक रंग में रंग गया है। मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा माता सती का पार्थिव शरीर ले जाते समय यहाँ माता की नाभि गिरी थी….

अन्नपूर्णा की चोटी पर बसा है मां पूर्णागिरि का धाम Purnagiri Mandir

सीओ वंदना वर्मा ने बताया कि मां पूर्णागिरि के दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं से किसी प्रकार की दिक्कत न हो इसके लिए व्यवस्थाओं से जुड़े सभी विभाग, मंदिर समिति, टैक्सी यूनियन, व्यापार मंडल आदि को विशेष निर्देश दिए गए हैं। जिले के अलावा अन्य जिलों से भी फोर्स पहुंच गई है।उन्होंने बताया कि अभी और फोर्स मंगाई गई है। इधर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जिला पंचायत की देखरेख में ठुलीगाड़ व बूम में शौचालय संचालित किए जा रहे हैं। ककराली गेट से मुख्य मंदिर तक लाइट की व्यवस्था की गई है। मंदिर समिति के अध्यक्ष ने बताया कि मेले में होली के बाद ही श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती है।

बाबा भैरवनाथ है मां के द्वारपाल

चम्पावत जनपद के टनकपुर कस्बे से 24 किमी दूर अन्नपूर्णा चोटी पर मां का धाम बसा है। मां के 52 शक्तिपीठों में एक पीठ यह भी है। माता सती की यहां पर नाभि गिरी थी। 1632 में श्रीचंद तिवारी ने यहां पर मंदिर की स्थापना की और माता की विधिवत पूजा अर्चना शुरू की। मान्यता है कि सच्चे मन से धाम में जो भी अपनी मन्नत मांगता है उसकी मुराद पूरी होती है।यहां पहुंचने वाले हर भक्त की मुराद जरूर पूरी होती है। यहां वर्ष भर श्रद्धालु शीश नवाते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्र में तो इस धाम में भक्तों का रेला उमड़ पड़ता है। उत्तर भारत ही नहीं अपितु देश भर के लोग यहां मां के दर्शन को आते हैं।शक्तिपीठ में पहुंचने से पूर्व भैरव मंदिर पर बाबा भैरवनाथ का वास है। वह उनके द्वारपाल के तौर पर खड़े हैं। उनके दर्शन के बाद ही मां के दर्शनों की अनुमति मिलती है। जहां वर्ष भर धूनी जली रहती है। बाबा भैरव को हनुमान का सारथी व शिव के काल का रूप भी माना जाता है।

नाभि उस स्थान पर गिरी जहाँ पूर्णागिरी मंदिर है

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सत्ययुग में दख प्रजापति की पुत्री पार्वती (सती) ने दख प्रजापति की इच्छा के विरुद्ध योगी (भगवान शिव) से विवाह किया था। भगवान शिव से बदला लेने के लिए, दखा प्रजापति ने एक बृहस्पति यज्ञ किया, जिसमें उन्होंने भगवान शिव और सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया। यह जानते हुए कि सती को आमंत्रित नहीं किया गया है, उन्होंने भगवान शिव के समक्ष यज्ञ में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने उन्हें रोकने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह कुछ भी नहीं समझ पाईं, इसलिए भगवान शिव को उन्हें यज्ञ में शामिल होने की अनुमति देनी पड़ी। वहाँ, एक अनचाही अतिथि होने के कारण उन्हें कोई सम्मान नहीं दिया गया। वास्तव में, उनके पिता ने भगवान शिव का अपमान किया, जो सती के लिए असहनीय था। अपने पिता द्वारा अपने पति को अपमानित करने की चाल का पता चलने पर, उन्होंने यज्ञ में कूदकर आत्महत्या कर ली।

सती के जलते हुए शरीर को देखकर, भगवान शिव ने दखा प्रजापति के यज्ञ को नष्ट कर दिया। उन्होंने गहरे दुःख के साथ उनके शरीर के अवशेषों को उठाया और ब्रह्मांड में विनाश का नृत्य किया। जिन स्थानों पर उनके शरीर के अंग गिरे, उन्हें शक्ति पीठ के रूप में मान्यता दी गई। पूर्णागिरी में, सती की नाभि (नाभि) उस स्थान पर गिरी जहाँ वर्तमान पूर्णागिरी मंदिर स्थित है। साल भर बड़ी संख्या में लोग देवी की पूजा करने के लिए यहां आते हैं।