आज के दौर में एक सुकून भरी नींद पाना किसी लग्जरी से कम नहीं रह गया है। एक समय था जब नींद न आना केवल एक सेहत से जुड़ी परेशानी मानी जाती थी, लेकिन अब इसी परेशानी ने भारत में एक बहुत बड़े उद्योग को जन्म दे दिया है।
हमारी बदलती और भागदौड़ भरी जिंदगी ने हमारी रातों की नींद छीन ली है और बदले में एक नई ‘स्लीप इकोनॉमी’ को फलने-फूलने का मौका दे दिया है। आइए, डिटेल में जानते हैं इसके बारे में।
क्यों बन रहा है नींद का इतना बड़ा बाजार?
चैन से सोने की चाहत में लोग अब अपनी जेबें ढीली करने से पीछे नहीं हट रहे हैं। डिजिटल स्लीप सॉल्यूशंस, खास तरह के गद्दे, स्मार्टवॉच, डॉक्टर की फीस और स्लीप ट्रैकिंग ऐप्स की मांग तेजी से आसमान छू रही है। बाजार के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं:
नींद से जुड़े सप्लीमेंट्स: यह क्षेत्र सबसे तेज रफ्तार से भाग रहा है। 2024 में 1,452 करोड़ रुपये का यह बाजार 2033 तक 5,993 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।
स्लीप एड प्रोडक्ट्स: साल 2025 में 2,797 करोड़ रुपये का अनुमानित बाजार, 2034 तक बढ़कर 6,109 करोड़ रुपये का हो सकता है।
अनिद्रा का बाजार: 2024 में यह 1,435 करोड़ रुपये था और 2033 तक 1,801 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू सकता है। वहीं, इसके इलाज से जुड़ा बाजार 2030 तक 1,278 करोड़ रुपये तक जाने का अनुमान है।
हमारी आदतें और गैजेट्स बन रहे नींद के दुश्मन
आंकड़े बताते हैं कि अनिद्रा देश में एक खामोश महामारी बन चुकी है, जिससे करीब 25 फीसदी भारतीय पीड़ित हैं। युवा पीढ़ी (जेन-जी और मिलेनियल्स) की हालत सबसे ज्यादा खराब है, जहां हर चौथा युवा ठीक से सो नहीं पा रहा है। शहरी क्षेत्रों का हाल यह है कि हर तीसरे व्यक्ति को लगता है कि वह अनिद्रा का शिकार है।
इस समस्या के पीछे सबसे बड़ा हाथ हमारी आदतों का है। करीब 87 प्रतिशत लोग बिस्तर पर जाने से पहले अपने मोबाइल फोन में लगे रहते हैं, और भारत में 60 प्रतिशत आबादी रात 11 बजे के बाद ही सोने जाती है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि अगली सुबह 48 प्रतिशत लोग सोकर उठने के बाद भी खुद को थका हुआ ही पाते हैं।
बीमारियों को न्योता दे रही अधूरी नींद
नींद पूरी न होने का नुकसान केवल दिन भर की सुस्ती नहीं है। यह हमारी याददाश्त और सही फैसले लेने की दिमागी क्षमता को सीधे तौर पर कमजोर करती है। लंबे समय तक नींद की कमी रहने से इम्युनिटी घटती है और मोटापा, डिप्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। महिलाओं के मामले में यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि उन्हें घर-दफ्तर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ हार्मोनल बदलावों का भी सामना करना पड़ता है।
गैजेट्स नहीं, लाइफस्टाइल है असली इलाज
भले ही बाजार आपको अच्छी नींद के लिए रोज नए गैजेट्स और दवाएं बेच रहा हो, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का स्पष्ट रूप से मानना है कि यह सब केवल कुछ समय की राहत दे सकते हैं। असली और पक्का समाधान हमारी दिनचर्या सुधारने में है। एक तय समय पर सोने की आदत डालना, सोने से पहले मोबाइल और लैपटॉप से दूरी बनाना और खुद को स्ट्रेस-फ्री रखना बेहद जरूरी है।
राहत की बात यह है कि अब कॉर्पोरेट जगत भी इस खतरे को भांप रहा है। कई कंपनियां अब अपने कर्मचारियों की मेंटल हेल्थ को तवज्जो दे रही हैं और उन्हें फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स वेलनेस प्रोग्राम जैसी सुविधाएं मुहैया करा रही हैं। कुल मिलाकर, नींद कोई प्रोडक्ट नहीं है जिसे खरीदा जा सके, बल्कि यह एक हेल्दी लाइफस्टाइल का ही इनाम है।

