Wife Murder Judgment ‘तुम जैसे 1000 पति रख सकती हूं’

Wife Murder Judgment पति पत्नी के रिश्तों में कई बार उग्र और हिंसक वारदात होने के मामले भी सामने आते हैं। ऐसे ही एक मामले में पत्नी के यह कहने पर कि ‘मैं तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं’, पति ने पत्नी का कत्ल कर दिया था। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी का ऐसा कहना गंभीर और अचानक उकसावा माना जा सकता है। और अदालत ने आरोपी पति की सजा घटा दी। क्या है यह पूरा मामला, और हाईकोर्ट ने किस आधार पर दी पति को सजा में दी राहत , जानेंगे इस लीगल स्टोरी में…

क्या है पूरा मामला और फैसले की पृष्ठभूमि Wife Murder Judgment

मामला मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का है, जहां वर्ष 2021 में पति-पत्नी के बीच हुए विवाद के दौरान पत्नी किरण की मौत हो गई थी। अभियोजन के अनुसार विवाद के दौरान पत्नी ने पति शिवा से कहा कि ‘वह उसके जैसे 1000 पति रख सकती है।’ इसके बाद गुस्से में आए पति ने पास पड़ा पत्थर उठाकर पत्नी पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। फिर निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट में सुनवाई और आरोपी को मिली राहत


आरोपी की अपील से जुड़े इस मामले को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने सुना , खंडपीठ ने कहा कि पत्नी की टिप्पणी पति के सम्मान और उसके अस्तित्व पर अप्रत्यक्ष प्रहार मानी जा सकती है।अदालत ने माना कि ऐसे शब्द परिस्थितियों के अनुसार किसी व्यक्ति का आत्मसंयम समाप्त कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी देखा कि आरोपी ने घटना के तुरंत बाद स्वयं पुलिस और अन्य लोगों को सूचना दी थी।यदि हत्या पूर्व नियोजित होती तो आरोपी का ऐसा व्यवहार सामान्य नहीं माना जाता। अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी अपने साथ कोई हथियार लेकर नहीं गया था बल्कि मौके पर पड़ा पत्थर उठाकर वार किया।

हाईकोर्ट ने पूरे घटनाक्रम, गवाहों के बयान और आरोपी के घटना के बाद के आचरण का पुनर्मूल्यांकन किया। अदालत ने माना कि घटना अचानक हुई थी और पहले से हत्या की कोई योजना नहीं थी। इसे ‘गंभीर और अचानक उकसावा’ माना जा सकता है।इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी की सजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग-I से बदलकर धारा 304 भाग-II के तहत कर दिया। इसके साथ ही उम्रकैद की सजा घटाकर सात वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दी गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर मामला उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही तय किया जाएगा।


दरअसल कानून में हत्या और गैर-इरादतन मानव वध के बीच अंतर करने में गंभीर और अचानक उकसावा यानी Grave and Sudden Provocation का सिद्धांत बड़ी भूमिका अदा करता है। और फिर सजा भी उसी आधार पर होती है। यदि कोई इंसान अचानक हुए गंभीर उकसावे के कारण अपना आत्मसंयम भूल बैठता है और अपराध कर डालता है, तो कुछ हालतों में हत्या का यह अपराध कम गंभीर श्रेणी में माना जा सकता है। हालांकि यह कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। अदालत ऐसे केस में, हर मामले में यह देखती है कि उकसावा कितना गंभीर था, घटना कितनी अचानक हुई और क्या आरोपी ने सोच-समझकर अपराध किया था।