Baba Harbhajan Singh ‘दोस्त, मैं शहीद हो चुका हूं , मेरी देह बर्फ से निकालो !

Baba Harbhajan Singh क्या कोई सैनिक शहादत के बाद भी अपनी ड्यूटी पर लौट सकता है? क्या गोलियों और बर्फीले तूफानों से परे कोई ऐसी रूह हो सकती है, जो मौत के बाद भी सरहद पर पहरा देती रहे? यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, न लोककथा. यह हकीकत है भारत-चीन सीमा पर तैनात 14 हजार फीट की ऊंचाई पर नाथू ला दर्रे की. जहां तापमान माइनस में चला जाए, जहां खून जमा देने वाली सर्द हवाएं हड्डियों को चीरती हों, वहां आज भी एक फौजी सीना ताने देश की रक्षा कर रहा है. भारतीय सेना जिसे अपना अभिन्न हिस्सा मानती है और खुद चीनी सेना भी जिनकी मौजूदगी से थर-थर कांपती है. यह दास्तान है देश के अमर सिपाही कैप्टन ‘बाबा’ हरभजन सिंह की.

‘बाबा’ हरभजन सिंह की आत्मा सरहद पर तैनात ! Baba Harbhajan Singh


कहानी की शुरुआत होती है 30 अगस्त 1946 को, पंजाब के सरदारपुरा गांव में. एक साधारण किसान परिवार में जन्मे हरभजन सिंह की रगों में बचपन से ही देशसेवा का जुनून दौड़ रहा था. 1947 में जब मुल्क का बंटवारा हुआ, तो परिवार सरदारपुरा पाकिस्तान से पंजाब के कपूरथला में आकर बस गया. 1965 में महज 19 साल की उम्र में हरभजन सिंह ने भारतीय सेना की 14 राजपूताना राइफल्स में कदम रख दिया. उसी साल भारत-पाक जंग छिड़ी और इस नौजवान ने अपनी जांबाजी से दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए. उनकी इसी बहादुरी को देखते हुए उनका ट्रांसफर 23 पंजाब रेजिमेंट में किया गया और तैनाती मिली सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील सिक्किम के नाथू ला दर्रे पर.

4 अक्टूबर 1968: वो खौफनाक दिन और एक अधूरा सफर

1962 की जंग के बाद सीमा पर तनाव चरम पर था. नाथू ला की पथरीली चट्टानों और ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच हरभजन सिंह के जिम्मे एक बेहद मुश्किल काम था. अग्रिम चौकियों तक खच्चरों पर रसद और गोला-बारूद पहुंचाना. लेकिन 4 अक्टूबर 1968 की वो तारीख एक मनहूस खबर लेकर आई. सिक्किम में कुदरत का कहर टूटा हुआ था, हर तरफ लैंडस्लाइड और बाढ़ मची थी. हरभजन सिंह सामान लादकर तिया-ला से देंगचुकला की तरफ बढ़ रहे थे. रास्ता फिसलन भरा था और अचानक उनका पैर फिसला. वो सीधे एक उफनती बर्फीली नदी के तेज बहाव में जा गिरे. कई दिनों तक सेना ने जमीन-आसमान एक कर दिया, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं मिला. नियमानुसार पांचवें दिन उन्हें ‘लापता/भगोड़ा’ दर्ज कर दिया गया. यह बात उनके साथियों के कलेजे को चीर गई, क्योंकि वो जानते थे कि हरभजन मैदान छोड़कर भागने वालों में से नहीं, बल्कि मुश्किलों के आगे चट्टान बनकर खड़े रहने वालों में से थे.

और फिर कहानी में वो मोड़ आया, जिसने विज्ञान और तर्क के सारे दरवाजे बंद कर दिए. जिस रात हरभजन को लापता घोषित किया गया, उसी रात उनके सबसे पक्के दोस्त प्रीतम सिंह के सपने में हरभजन सिंह आए. उन्होंने कहा-‘दोस्त, मैं शहीद हो चुका हूं. मेरी देह इस जगह पर बर्फ के नीचे दबी है. मुझे वहां से निकालो और यहां मेरा एक मंदिर बना देना, मैं अपनी ड्यूटी कभी नहीं छोड़ूंगा.’ सुबह जब प्रीतम सिंह ने यह बात बटालियन को बताई, तो पहले किसी को यकीन नहीं हुआ. लेकिन जब फौजी टुकड़ी उसी लोकेशन पर पहुंची, तो महज कुछ ही मिनटों में बर्फ के नीचे से हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर बरामद हो गया. पूरी सेना सन्न रह गई. सेना ने अपनी गलती सुधारी, पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया और उन्हें महावीर चक्र से नवाजा गया. लेकिन असली रहस्य तो इसके बाद शुरू होना था.

शहादत के कुछ ही दिनों बाद सरहद पर अजीबोगरीब वाकये होने लगे. पहरे पर तैनात जवानों को रात में आभास होता कि कोई अनदेखी ताकत उन्हें दुश्मनों की हरकतों से पहले ही सावधान कर रही है. अगर रात की कड़ाके की ठंड में किसी सिपाही की आंख लग जाती, तो उसे गाल पर एक जोरदार तमाचा महसूस होता और कोई झकझोर कर उठा देता. मानो बाबा कह रहे हों, ‘सरहद पर लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं!’

हैरानी की बात यह थी कि यह खौफ सिर्फ भारतीय खेमे तक सीमित नहीं था. सीमा पार चीनी सैनिकों ने कई बार देखा कि एक फौजी सफेद घोड़े पर सवार होकर रात में गश्त लगा रहा है. चीनी अफसरों ने तो बाकायदा भारतीय कमांडरों को चिट्ठी लिखी कि ‘अपने उस सफेद घोड़े वाले सैनिक को वापस बुला लो.’ लेकिन भारतीय सेना जानती थी कि यह कोई आम इंसान नहीं, बल्कि देश का एक अमर पहरेदार है. आलम यह हुआ कि जब भी दोनों देशों के बीच फ्लैग मीटिंग होती, भारतीय सेना सम्मान और भरोसे के रूप में बाबा हरभजन सिंह के लिए एक खाली कुर्सी रखती थी.

भारतीय सेना के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ. बाबा हरभजन सिंह को मरणोपरांत भी ‘एक्टिव सोल्जर’ माना गया. हर महीने उनके परिवार को बाकायदा पूरी सैलरी भेजी जाती रही. समय के साथ पदोन्नति मिलती रही और वे सिपाही से तरक्की पाकर कैप्टन बने. हर साल सितंबर में उन्हें 2 महीने की सालाना छुट्टी दी जाती थी. जब वो छुट्टी पर जाते, तो जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन से पंजाब के कपूरथला तक ट्रेन की फर्स्ट क्लास एसी बोगी में उनके नाम की एक सीट बुक होती थी. दो फौजी जवान उनकी वर्दी, जूते और सामान लेकर जाते. कपूरथला स्टेशन पर हजारों की भीड़ ‘बाबा हरभजन सिंह अमर रहें’ के नारों से आसमान गुंजा देती थी.