Badrinath Yatra 2026 बद्रीनाथ मंदिर के कपाट इस बार 23 अप्रैल को खुलेंगे। इसके दर्शन के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। बद्रीनाथ मंदिर न सिर्फ उत्तराखंड के 4 धामों में से एक है बल्कि ये देश के 4 धामों में से भी एक है। इस मंदिर से जुड़ी अनेक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो इसे और भी खास बनाती हैं। इस मंदिर की ऐसी ही एक परंपरा है कॉकरोच को भोग लगाने की, सुनने में ये बात अजीब लगे लेकिन ये सच है। आगे जानिए क्या है ये परंपरा और इससे जुड़ी खास बातें…
पहले जीव-जंतुओं को लगाते हैं भोग Badrinath Yatra 2026

बद्रीनाथ मंदिर में भगवान को भोग लगाने से पहले जीव-जंतुओं को भोग लगाया जाता है। इन जीव-जंतुओं में गाय व पशु-पक्षियों के साथ ही कॉकरोच भी शामिल है। ये बात सुनकर किसी को यकीन नहीं होगा, लेकिन ये सच है। कॉकरोच को उत्तराखंड की स्थानीय भाषा में झोड़ू सांगला कहते हैं। रोज दोपहर में भगवान बद्रीनाथ को राजभोग लगाने से पहले अन्य जीव-जंतुओं के साथ कॉकरोच को भी भोग लगाया जाता है।

क्यों लगाते हैं कॉकरोच को भोग?
विद्वानों का मत है कि भगवान बद्रीनाथ राजभोग खाने से पहले सभी जीव-जंतुओं को भोजन से तृप्त करते हैं। इसी मान्यता के चलते अन्य पशु-पक्षियों के साथ यहां रोज कॉकरोच को भी भोग लगाया जाता है। यहां रोज दोपहर को कॉकरोचों को चावल का भोग लगाते हैं जो तप्तकुंड के पास गरुड़ कुटी में रख दिया जाता जाता है। इसके बाद ही भगवान को भोग लगाते हैं।

किसने शुरू की ये परंपरा?
ऐसा कहते हैं कि बद्रीनाथ मंदिर में भगवान से पहले अन्य जीव-जंतुओं को भोग लगाने की परंपरा और किसी से नहीं पहले आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। वे यहां 8वीं शताब्दी में आए थे और तपस्या भी की थी। आदि गुरु शंकराचार्य ने ही बद्रीनाथ मंदिर को खोया हुआ गौरव पुन: दिलाया। शंकराचार्य ने ही भगवान बद्रीनाथ की प्रतिमा को नारद कुंड से निकालकर यहां स्थापित किया।

