BC Khanduri Death आखिरी सलाम! मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की कहानी

BC Khanduri Death उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री मेजर जनरल रिटायर्ड भुवन चंद्र खंडूरी का आज निधन हो गया है… देशभर से न सिर्फ भाजपा के नेता और कार्यकर्ता बल्कि उनके लाखों प्रश्षकों में इस खबर के बाद गहरा दुख हैदेश की राजनीत‍ि में भुवन चंद्र खंडूरी (Bhuwan Chandra Khanduri) क‍िसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. बीजेपी के द‍िग्‍गज नेता रहे भुवन चंद्र खंडूरी भले ही सक्र‍िय राजनीत‍ि से दूर रहे लेक‍िन राजनीत‍ि में उनकी छाप उनका कद कभी कम नहीं हुआ। उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री रहने के दौरान उन्‍होंने भ्रष्‍टाचार मुक्‍त शासन का नारा द‍िया था, जो आज की मौजूदा राजनीत‍ि में सबसे ज्‍यादा प्रभावी द‍िखाई दे रहा है. भुवन चंद्र खंडूरी की स‍ियासी पारी की बात करें तो वह सेना के एक अध‍िकारी से मुख्‍यमंत्री (Chief Minister) तक का सफर तय करने में सफल रहे हैं. वहीं भुवन चंद्र खंडूरी को देश में सड़कों का जाल बि‍छाने के ल‍िए भी जाना जाता है. वह BJP की अटल सरकार में भूतल पर‍िवहन मंत्री रह चुके हैं. उनके मंत्री रहते हुए ही प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना शुरू हुई थी.

भुवन चंद्र खंडूरी – सैनिक से राजनेता बनने की कहानी BC Khanduri Death


भुवनचंद्र खंडूरी का जन्म एक अक्टूबर 1934 को देहरादून में हुआ था. इनके पिता का नाम जय बल्लभ खंडूरी था, जो कि पेशे से पत्रकार थे और माता का नाम दुर्गा देवी था जो एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं. भुवनचन्द्र खंडूरी ने डिफेंस मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है. उन्‍होंने लंबे समय तक एक अध‍िकारी के तौर पर सेना में काम क‍िया है. सेना में रहते हुए भुवन चंद्र खंडूरी को 1982 में राष्ट्रपति द्वारा अति विशिष्ट सेना मेडल से सम्मानित किया जा चुका है. भुवनचंद्र खंडूरी की पत्नी का नाम अरुण खंडूरी है. इनके दो बच्चे हैं जिनमें एक बेटा मनीष खंडूरी और बेटी रितु खंडूरी हैं.


1991 में पहली बार बने सांसद

भुवनचंद्र खंडूरी पहली बार 1991 में सांसद चुने गए थे. साथ ही वह 10वीं 12वीं 13वीं 14वीं और 16वीं लोकसभा में सांसद के तौर पर चुने गए. वहीं वह 1992 से 1997 तक वह उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष भी रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में भुवन चंद्र खंडुरी को राज्य मंत्री बनाए गया था. उन्हें सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार प्रदान किया गया. 2003 में वह कैबिनेट मंत्री भी बने.

दो बार उत्‍तराखंड के मुख्यमंत्री बने

2007 के चुनाव में जब उत्‍तराखंड में बीजेपी को स्‍पष्‍ट बहुमत म‍िला. ज‍िसके बाद बीजेपी ने भुवन चंद्र खंडुरी के नेतृत्‍व में सरकार बनाई. इस दौरान भुवन चंद्र खंडूरी ने प्रदेश में भ्रष्‍टाचार मुक्‍त शासन स्‍थाप‍ित करने के ल‍िए काम क‍िया और अपने कई फैसलों से उत्‍तराखंड में अपनी कड़क शासन वाली पहचान बनाई. हालांक‍ि इस दौरान उनका साथ व‍िधायकों के साथ टकराव भी होता रहा और बगावती सुर कई बार सामने आते रहे, लेक‍िन 2009 के आम चुनावों में बीजेपी को उत्‍तराखंड से एक सीट नहीं म‍िली तो बीजेपी ने उन्‍होंने ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद रमेश पोखर‍ियाल न‍िशंक को मुख्‍यमंत्री बनाया गया. हालांकि 10 सितंबर, 2011 को रमेश पोखरियाल निशंक की जगह वापस भुवन चंद्र खंडुरी ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

2012 के चुनाव में म‍िली हार

उत्‍तराखंड की राजनी‍त‍ि में कड़क मुख्‍यमंत्री के तौर पर अपनी पहचान बना चुके भुवन चंद्र खंडूरी के ल‍िए 2012 का चुनाव बेहद ही न‍िराशाजनक रहा. यह चुनाव उनके मुख्‍यमंत्री रहते हुए आयोज‍ित क‍िया गया. ज‍िसमें उन्‍हाेंने कोटद्वार से चुनाव लड़ा, लेक‍िन इस चुनाव में उन्‍हें हार का सामना करना पड़ा. हालांक‍ि इस चुनाव में बीजेपी भी बहुमत से दूर रही और कांग्रेस ने सरकार बनाई. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में वह गढ़वाल सीट से सांसद चुने गए. जबक‍ि 2019 के चुनाव से वह दूर रहे.


प्रमुख पुरस्कार और उपलब्धियाँ

1983 में उन्हें भारतीय सेना में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत के राष्ट्रपति से “अति विशिष्ट सेवा पदक (एवीएसएम)” प्राप्त हुआ।
उन्होंने गढ़वाल में अपने दादा द्वारा 1917 में स्थापित एक शैक्षणिक ट्रस्ट “चंद्र बल्लभ ट्रस्ट” के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली।
वे उत्तरांचल प्रदेश संघ समिति के अध्यक्ष भी थे और उन्होंने उत्तराखंड नामक नए राज्य के गठन में योगदान दिया था।
उन्हें 2013 में “मदर टेरेसा इंटरनेशनल अवार्ड” से सम्मानित किया गया था।
वे 1990-93 के दौरान देहरादून स्थित पार्वती संस्कृति परिषद के संरक्षक थे।
वह 1992 से पूर्व सैनिक सेवा परिषद, उत्तर प्रदेश और 1994-96 तक उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के अध्यक्ष रहे।
वे 1990 से 2000 तक भारतीय वन्यजीव सोसायटी से भी जुड़े रहे और 1998 से 2000 तक जीबी पंत हिमालय पर्यावरण और विकास समिति के सदस्य थे।