Chamgadar Tapu हरिद्वार में हर की पैड़ी के पास स्थित ‘चमगादड़ टापू’ एक प्रसिद्ध खुला मैदान और गंगा किनारे का क्षेत्र है, जिसका नामकरण ब्रिटिश काल के दौरान यहाँ मौजूद घने जंगलों और भारी संख्या में उल्टे लटके रहने वाले चमगादड़ों के कारण हुआ था। आज़ादी के शुरुआती दौर और ब्रिटिश काल में यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था और यहाँ बड़े-बड़े पेड़ों पर चमगादड़ों का बसेरा हुआ करता था। समय के साथ शहरीकरण और विकास के कारण जंगल कम हो गए, लेकिन यह पुराना नाम आज भी प्रचलित है

हरिद्वार के ज्वालापुर में सैकड़ों की संख्या में चमगादड़ हैं. आजतक इन चमगादड़ों ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया. यहां के चमगादड़ नकारात्मक ऊर्जा नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा देने वाले हैं. हरिद्वार का व्यवसायिक क्षेत्र माने जाने वाले इस नगर को मां ज्वाला देवी का आशीर्वाद मिला हुआ है, जिसके कारण यहां के पुरोहित इसे ज्वालापुर के नाम से बुलाते थे. ज्वालापुर का इतिहास भी हजारों साल पुराना है. ज्वालापुर में पांडेवाली इलाके को गुरू गोरखनाथ की तपस्थली माना जाता है. ज्वालापुर के पांडेवाली गली में स्थित गुरू गोरक्षनाथ मंदिर में गुरू गोरखनाथ जी के शिष्यों की भी तपस्थली रही है.
क्या आपने देखा है चमगादड़ टापू ? Chamgadar Tapu

धर्म के जानकार बताते हैं कि कुख्यात तंत्र सम्राट और अघोर तंत्र के महान उपासक विलन की भी यही तपस्थली है. हर 12 साल में लगने वाले कुंभ से पहले साधु संत इसी स्थान पर एक महीना निवास करते हुए जप-तप और ध्यान करते हैं. उसके बाद ही कुंभ की पहली पेशवाई निकलती है, जो कुंभ को और भव्य और सुंदर बनाती है.

बात अगर चमगादड़ों की करें तो तंत्र सिद्धि के सबसे बड़े तपस्थल पर इनकी संख्या बहुतायत है. ज्वालापुर में गोरखनाथ मंदिर परिसर के पेड़ों पर लटके इन चमगादड़ों को पुण्यदायक माना जाता है. ज्योतिषाचार्य प्रतीक मिश्रपुरी बताते हैं कि कई एकड़ में फैला यह परिसर पूरी तरह से सकारात्मक ऊर्जा और दैवीय कृपा से भरपूर है. यहां के घने पेड़ों पर हजारों साल से चमगादड़ों का वास बताया जाता है. यहां के चमगादड़ों की खासियत है कि ये सकारात्मक प्रभाव डालते हैं. हजारों सालों से यहां डेरा जमाये इन चमगादड़ ने न ही किसी को नुकसान पहुंचाया है और न ही किसी रोग का कारण बने हैं.

