History-of Spectacles जब चश्मा नहीं था, तब कैसे देखते थे ?

History-of Spectacles आज अगर किसी की नजर कमजोर हो जाए, चश्मा उसका सहारा बनता है। कुछ लोग कॉन्टैक्ट लेंस लगवा लेते हैं, तो कुछ लेजर सर्जरी करा लेते हैं। वैसे क्या आपने कभी सोचा है कि सैकड़ों साल पहले, जब चश्मा ही नहीं था, तब लोग धुंधली नजर के साथ कैसे जीते थे? यहां हम इसी सवाल का जवाब दे रहे हैं,  इंसान की नजर कमजोर होना कोई नई समस्या नहीं है। इतिहास बताता है कि प्राचीन सभ्यताओं के लोग भी उम्र बढ़ने के साथ धुंधला देखने लगते थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उस समय आधुनिक ऑप्टिकल तकनीक मौजूद नहीं थी। इसलिए लोगों ने अपने अनुभव और उपलब्ध संसाधनों से कई दिलचस्प उपाय खोज निकाले थे।

छोटे छेद से देखते थे दुनिया History-of Spectacles

पुराने समय में कुछ लोग एक पतली धातु या लकड़ी की पट्टी में छोटा-सा छेद बनाकर उसके आर-पार देखने की कोशिश करते थे। इसे ही आज पिनहोल इफेक्ट कहा जाता है। छोटे छेद से देखने पर आंख में कम बिखरी हुई रोशनी प्रवेश करती है, जिससे धुंधली चीजें कुछ हद तक साफ दिखाई देने लगती हैं। यह तरीका इलाज नहीं था, लेकिन अस्थायी राहत जरूर देता था।

पानी और कांच का सहारा
इतिहासकारों के अनुसार, रोमन दार्शनिक सेनेका के बारे में कहा जाता है कि वे पानी से भरे कांच के पात्र के जरिए अक्षरों को बड़ा करके पढ़ते थे। इसी तरह कुछ लोग पारदर्शी क्रिस्टल या चमकदार कांच के टुकड़ों का इस्तेमाल भी करते थे। इन्ही चीजों ने आगे चलकर मैग्निफाइंग ग्लास और फिर चश्मे के विकास की राह खोली।

पढ़ने का तरीका बदल लेते थे
जब नजर कमजोर होने लगती थी, तो लोग पढ़ने-लिखने का तरीका भी बदल देते थे। कोई किताब को आंखों के बहुत करीब लाता, तो कोई उसे दूर करके देखने की कोशिश करता। कई लोग तेज धूप या दीपक की ज्यादा रोशनी में पढ़ते थे, ताकि अक्षर स्पष्ट दिखाई दें।

‘रीडिंग स्टोन’ ने बदली तस्वीर
11वीं और 12वीं शताब्दी में यूरोप में रीडिंग स्टोन का इस्तेमाल शुरू हुआ। यह एक गोल या अर्धगोलाकार पारदर्शी कांच का टुकड़ा होता था, जिसे लिखे हुए शब्दों के ऊपर रखा जाता था। इससे अक्षर बड़े दिखाई देते थे और पढ़ना आसान हो जाता था। इसे आधुनिक चश्मे का शुरुआती रूप माना जाता है।