Khatima firing incident खटीमा गोलीकांड को याद करते ही आज भी उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के कानों में गोलियों की तड़तड़ाहट, पुलिस की लाठियों की आवाज और जनता की चीख पुकार गूंजने लगती है। कनालीछीना, पिथौरागढ़ निवासी कैप्टन दिगारी बताते हैं कि वर्ष 1959 को तीन कुमाऊं रेजिमेंट में सिपाही के रूप में भर्ती होने के बाद वह ऑर्डिनरी कैप्टन के रूप में वर्ष 1988 को सेवानिवृत्त हुए। उसके बाद वह डीएससी में चले गए थे। जुलाई 1994 को डीएससी से रिटायर्ड होने के दो माह बाद ही खटीमा गोलीकांड हो गया था। उस दिन रामलीला मैदान में करीब 10 हजार लोगों का जुलूस पृथक राज्य मांग करता हुआ सितारगंज रोड की ओर बढ़ा और फिर लौटकर कोतवाली के गेट से निकल रहा था। इसी दौरान पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। जिसमें सात लोगों के शहीद होने के साथ ही कई लोग घायल हुए। घायलों में वह भी शामिल थे। वह आंदोलन एक जनक्रांति की तरह था।
पहली शहादत खटीमा की जमीं से हुई थी Khatima firing incident

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शहीद राज्य आंदोलनकारियों को नमन करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के लिए उनके संघर्ष, त्याग और बलिदान के कारण ही उत्तराखण्ड राज्य का सपना साकार हुआ। शहीद आंदोलनकारियों ने उत्तराखण्ड के जिस स्वरूप का सपना देखा था, उसे साकार करने के लिए राज्य सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि 1 सितंबर को खटीमा कांड, 2 सितंबर को मसूरी गोलीकांड और 2 अक्टूबर को रामपुर तिराहा कांड उत्तराखण्ड के इतिहास के वे काले अध्याय हैं, जिन्हें हम कभी भुला नहीं सकते। राज्य निर्माण के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों का सर्वाेच्च बलिदान प्रदेशवासियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के दौरान शहीद हुए आंदोलनकारियों और उनके परिवारों के प्रति सम्मान राज्य सरकार की प्राथमिकता है।

राज्य निर्माण के लिए सबसे पहली शहादत खटीमा की जमीं से हुई थी. साल 1994 में उत्तराखंड राज्य के निर्माण के लिए जहां पूरे प्रदेश में आंदोलन चल रहा था. वहीं, सीमांत क्षेत्र खटीमा में 1 सितम्बर 1994 को हजारों की संख्या में राज्य निर्माण की मांग को लेकर पुरुष और महिलाएं अपने बच्चों तक को लेकर सड़कों पर उतर आयी थी. इस आंदोलन के दौरान खटीमा के तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर डीके केन ने आंदोलनकारीयों पर खुलेआम गोली चलाई थी. इस गोलीकांड में सात आंदोलनकारी शहीद हो गए थे और सैकड़ों लोग घायल हुए थे, इस घटना के बाद आंदोलन की चिंगारी और भी भड़क उठी. जिसके बाद उग्र आंदोलन के फलस्वरूप साल 2000 में राज्य का निर्माण हुआ.

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य आंदोलनकारियों एवं उनके आश्रितों के सम्मान और कल्याण के लिए राज्य सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गये हैं। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान शहीद हुए राज्य आन्दोलनकारियों के आश्रितों की पेंशन प्रतिमाह ₹3,000 से बढ़ाकर ₹5,500 किए जाने का फैसला लिया गया है। इसी प्रकार, राज्य आन्दोलन के दौरान दिव्यांग पूर्णतः शय्याग्रस्त हुए राज्य आन्दोलनकारियों की पेंशन प्रतिमाह ₹20,000 से बढ़ाकर ₹30,000 किए जाने तथा उनकी देखभाल के लिए मेडिकल अटेंडेंट की व्यवस्था किए जाने का निर्णय लिया गया है।

