Koshiyari Padma Bhusan पद्मभूषण सम्मान से नवाजे गए भगत दा

Koshiyari Padma Bhusan उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया。 राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 25 मई को नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष अलंकरण समारोह में उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया। भगत दा’ के नाम से लोकप्रिय कोश्यारी को यह सम्मान शिक्षा, सामाजिक कार्य और सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे और उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया है。 उनका राजनीतिक सफर काफी लंबा रहा है और उन्होंने उत्तराखंड राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया है।

लेखक के रूप में भी प्रसिद्ध हैं कोश्यारी Koshiyari Padma Bhusan


आपातकाल के दौरान मीसा के तहत जेल जाने वाले कोश्यारी ने आरएसएस के साथ-साथ उत्तरांचल उत्थान परिषद के माध्यम से भी शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में कार्य किया। उन्होंने ‘पर्वत पीयूष’ साप्ताहिक का भी संपादन किया। राजनीतिक क्षेत्र में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य, उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता, राज्यसभा सांसद, लोकसभा सांसद और महाराष्ट्र के राज्यपाल रह चुके हैं। ऊर्जा मंत्री के रूप में उन्होंने टिहरी जल विद्युत परियोजना समेत कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को आगे बढ़ाया। उनकी पुस्तकें ‘उत्तरांचल प्रदेश क्यों’ और ‘उत्तरांचल प्रदेश: संघर्ष एवं समाधान’ काफी चर्चित हैं।


राजनीतिक और सामाजिक सफर जन्म

भगत के बारे में जानिए: भगत सिंह कोश्यारी का जन्म 17 जून 1942 को बागेश्वर जिले के पहाड़ी इलाके के सुदूर गांव पलानधुरा में हुआ था. अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की. साल 1964 में आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री ली. उन्होंने साल 1964-1965 के दौरान राजा का रामपुर (एटा, उत्तर प्रदेश) में लेक्चरर के रूप में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की. हालांकि, शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से प्रेरित होकर उन्होंने साल 1965 के बाद से खुद को पूरी तरह से शैक्षणिक और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया.

उत्तर प्रदेश में किया अध्यापन का काम

भगत कोश्यारी ने सरस्वती शिशु मंदिर कासगंज (उत्तर प्रदेश) में पढ़ाना शुरू किया. जहां उन्होंने छोटे बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय मूल्य प्रदान करने का काम किया. साल 1966 में उन्होंने पिथौरागढ़ में ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ की स्थापना की.इसके अलावा पिथौरागढ़ में ही विवेकानंद इंटर कॉलेज की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सरस्वती विहार (नैनीताल) से सक्रिय रूप से जुड़े रहे. उन्होंने कई सालों तक आरएसएस के विभाग कार्यवाहक के रूप में काम किया और बाद में उत्तरांचल उत्थान परिषद के सचिव बने. जो उत्तराखंड में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए समर्पित संगठन है.