देहरादून से अनीता तिवारी की विशेष रिपोर्ट –
Phool Dei Festival फूलदेई उत्तराखंड का एक लोक पर्व है जो कि प्रकृति के प्रति हमारे प्रेम को दर्शाता है और यह प्रकृति का आभार प्रकट करने वाला लोक पर्व है।बच्चों में उल्लास का प्रतीक यह त्यौहार उत्तराखंड में चैत् माह के प्रारंभ में ही बसंत ऋतु के आगमन में मनाया जाता है, हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र के माह से ही नव वर्ष शुरू होताहै, इस समय प्रकृति नए-नए फूलों से लबालब भरी रहती है और अपनी सुंदरता से सबका मन मोह लेती है और चारों ओर हरियाली छाई रहती है।
Phool Dei Festival “फूलदेई, फूलदेई, छम्मा देई, छम्मा देई, दैंणी द्धार, भर भकार, यो देली सौं, बारंबार नमस्कार”

- Phool Dei Festival यह नई उमंग और नई उम्मीद का त्यौहार माना जाता है| जब पहाड़ों में बसंत अपने यौवन पर होता है, तभी आता है उत्तराखंड का लोकपर्व फूलदेई- फूलों का त्यौहार, जो अपनी तरह का पूरी दुनिया में एक अनूठा लोकपर्व है| कहीं इसे फूल संक्रांत कहते हैं, तो कहीं फूलदेई
Phool Dei Festival कैसे मनाया जाता है फूलदेई पर्व ?

- Phool Dei Festival चैत्र के महीने के शुरू से ही बच्चों की टोली प्रात काल में उठकर नहा धोकर जंगलों से या नजदीकी क्षेत्र से विभिन्न प्रकार के रंग बिरंगे फूलों को इकट्ठा करके बांस के कंडी में भरकर लाते हैं फूलकंडी को लेकर बच्चे घर-घर जाते हैं और घर की देहरी पर फ्योली, बुरांश अन्य रंग बिरंगे फूल डालते हैं तथा परिवार के सुख -शांति और समृद्धि के लिए शुभकामनाएं देते हैं।

Phool Dei Festival घर की महिलाओं के द्वारा घर पर आए हुए बच्चों की टोलियों का स्वागत किया जाता है और उपहार स्वरूप उन्हें चावल गुड़ , मिठाई एवं दक्षिणा के रूप में कुछ पैसे दिए जाते हैं। इस मौके पर बच्चों एवं लोगों के द्वारा उत्तराखंड के लोकगीत भी गाये जाते हैं, प्रसिद्ध फूलदेई क्षमा देई गीत भी गाया जाता है।
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