Sanatan Dharmaसनातन धर्म भारतीय उपमहाद्वीप से उत्पन्न एक अनादि, शाश्वत और प्राचीनतम जीवन शैली व व्यवस्था है, जिसका न आदि है न अंत। यह किसी एक संस्थापक या ग्रन्थ तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्य, अहिंसा, करुणा, और प्रकृति-संस्कृति के संरक्षण पर आधारित है। इसमें वेदों, उपनिषदों, गीता और ऋषियों की परंपराओं को आधार मानकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों को समझा जाता है।
सनातन धर्म की प्रमुख विशेषताएं:
शाश्वत मार्ग: सनातन का अर्थ है ‘शाश्वत’ या ‘सदा बना रहने वाला’। यह धर्म मानव सभ्यता के पूर्व से अस्तित्व में माना जाता है।
जीवन शैली: यह केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक उच्च जीवन शैली है जो जीव मात्र में परमात्मा का दर्शन सिखाती है।
आधारभूत ग्रंथ: वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत को मुख्य ग्रंथ माना जाता है।
नैतिक सिद्धांत: सत्य, अहिंसा, करुणा, क्षमा, दान, जप और तप इसके मूल स्तंभ हैं।
विस्तार: इसमें ईश्वर के अस्तित्व के बारे में भी प्रश्न करने (तर्क) की स्वतंत्रता है, जो इसे अत्यंत लचीला और समावेशी बनाता है।
सनातन में पंच देव कौन हैं ? Sanatan Dharma

सनातन में पांच देवों की विशेष मान्यता है। पांच देवों के संदेश युवा अपने हृदय में धारण करें। गणेश विवेक के देव हैं। आवश्यकता है विवेक की। दूसरे देव, सूर्य की उपासना का अर्थ है कि हम उजाले में जिएं। प्रकाश की तरफ हमारी गति हो। सनातन कहता है कि युवाओं को प्रकाश में जीने का संकल्प लेना चाहिए। तीसरे देव हैं विष्णु। विष्णु यानी व्यापकता। हमारे विचार विशाल हों। संकीर्णता के कारण अच्छी विचारधारा भी लड़ रही हैं। विशाल दृष्टिकोण की आवश्यकता हमेशा रही है, मगर आज और भी अधिक है। चौथे देव शिव हैं विश्वास। विश्वास के बिना सब अधूरा है। उसके तीन नेत्र हैं। पांचवी, दुर्गा श्रद्धा हैं। ये पंच देव की आध्यात्मिक पूजा है

शास्त्रों में कई जगहों पर भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्माजी, गणेशजी और जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा को पंच देव कहा गया है। वहीं कई जगहों पर सूर्य देव, भगवान गणेश, शिवजी, विष्णुजी और ब्रह्माजी को पंच देव कहा गया है। इनमें सबसे पहले सूर्य देव की पूजा की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश, मां दुर्गा, भगवान शिव और विष्णु जी की पूजा की जाती है। वास्तु शास्त्र में भी पंच देवों का उल्लेख किया गया है।
इस शास्त्र के अनुसार ईशान कोण भगवान विष्णु को समर्पित है। इसलिए भगवान विष्णु को इसी कोने में स्थापित करना चाहिए। वहीं भगवान शिव को दक्षिण-पूर्व कोने में स्थापित करना चाहिए। जबकि भगवान गणेश को दक्षिण-पश्चिम कोने में और जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा को उत्तर-पश्चिम कोने यानी उत्तर और पश्चिम दिशा में स्थापित करना चाहिए। साथ ही घर के बीच में इष्ट देव या सूर्य देव को स्थापित करें।

पंच देवों की पूजा का महत्व
ब्रह्मांड की रचना में पांच तत्वों का बहुत महत्व है- वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी और आकाश। इन पांच तत्वों को आधार मानकर पंचदेव की पूजा की जाती है।
भगवान सूर्य नारायण
पूरा ब्रह्मांड सूर्य से प्रकाशित है। सूर्य ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्हें प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। पांच तत्वों में सूर्य को आकाश का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए सूर्य देव की पूजा की जाती है।
भगवान गणेश
सभी देवताओं में गणेश जी सबसे पहले पूजे जाते हैं। इन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है। इसीलिए हर शुभ कार्य में सबसे पहले इनकी पूजा की जाती है। ताकि काम बिना किसी बाधा के पूरा हो जाए।
भगवान शिव, मां दुर्गा
ब्रह्मांड की शुरुआत भगवान शिव और शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा दोनों से होती है। ये पूरे जगत के माता-पिता हैं। मां दुर्गा स्वयं प्रकृति हैं और भगवान शिव देवों के देव हैं। जीवन और काल भी उनके अधीन हैं।
श्री हरि विष्णु
भगवान श्री हरि विष्णु संपूर्ण जगत के पालनहार हैं। सृष्टि के संचालन का दायित्व उन्हीं पर है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य में विष्णु जी की पूजा का प्रावधान है। देवउठनी एकादशी से विष्णु जी के जागने के बाद ही शुभ कार्य प्रारंभ होते हैं।

