Swastika Symbol स्वस्तिक शब्द को ‘सु’ औरं ‘अस्ति’ दोनों से मिलकर बना है। ‘सु’ का अर्थ है शुभ और ‘अस्तिका अर्थ है- होना यानी जिस से ‘शुभ हो’, ‘कल्याण हो वही स्वस्तिक है। हिन्दू धर्म परंपराओं में हर मांगलिक, धार्मिक कर्म, पूजा, उपासना या कार्य की शुरुआत स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर की जाती है। स्वस्तिक देवशक्तियों, शुभ व मंगल भावों का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि इस मंत्र में चार बार आए ‘स्वस्ति’ शब्द के रूप में चार बार कल्याण और शुभ की कामना से श्रीगणेश के साथ इन्द्र, गरूड़, पूषा और बृहस्पति का ध्यान और आवाहन किया गया है। आपको आज हम बता रहे हैं
गणेशजी और स्वस्तिक के बीच का संबंध Swastika Symbol

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु।।
शास्त्रों के मुताबिक स्वस्तिक परब्रह्म, विघ्रहर्ता व मंगलमूर्ति भगवान श्रीगणेश का भी साकार रूप है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा ‘गं’ बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्रीगणेश का स्थान माना जाता है। इसमें जो चार बिंदियां होती है, उनमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानी कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है।इसी तरह वेद भी ‘स्वस्तिक’ श्रीगणेश का स्वरूप होने की बात कहते हैं। स्वस्तिक बनाने के धर्म दर्शन में व्यावहारिक नजरिए से संकेत यही है कि जहां माहौल और संबंधों में प्रेम, प्रसन्नता, श्री, उत्साह, उल्लास, सौंदर्य व विश्वास होता है, वहां शुभ, मंगल और कल्याण होता है यानी श्री गणेश का वास होता है। उनकी कृपा से अपार सुख और सौभाग्य प्राप्त होता है। जानें कब से चली आ रही है स्वस्तिक बनाने की परंपरा और किन देशों में है प्रचलन….

आर्यों ने किया स्वस्तिक का आविष्कार
आज तक स्वस्तिक का प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किया गया है। कुछ धर्म और समाजों में स्वस्तिक का गलत अर्थ लेकर उसका गलत जगहों पर इस्तेमाल किया तो कुछ ने उसके सकारात्मक पहलू को समझा। स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, दुनिया के कई दूसरे देशों में विभिन्न स्वरूपों में देखा गया है। जर्मनी, यूनान, अमेरिका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान, फ्रंस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार स्वास्तिक का चिह्न आर्य युग और सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुराना है। स्वास्तिक अपनी शुभता की वजह से जाना जाता है और यह शांति एवं निरंतरता का प्रतीक है। हिटलर ने अपने आर्य वर्चस्व सिद्धांत के लिए चुना था।इसे प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध से पहले नाजी जर्मनी की नाजी पार्टी ने अपनाया था। स्वास्तिक 11,000 वर्षों से भी पुराना है और पश्चिमी एवं मध्य– पूर्वी सभ्यताओं तक इसके प्रसार का पता चलता है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि यूक्रेन का स्वास्तिक पाषाण काल के समय यानि 12,000 वर्ष पुराना माना जाता है
– इस मंगल-प्रतीक का गणेश की उपासना, धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ, बही-खाते की पूजा की परंपरा आदि में विशेष स्थान है।चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र, वरुण और सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को पाने के लिए स्वस्तिक बनाया जाता है। यह चारों दिशाओं और जीवन चक्र का भी प्रतीक है।

