Sri Guru Ram Rai History : मानवता के देवता गुरु राम राय की कहानी

देहरादून से अनीता तिवारी की विशेष खबर –

Sri Guru Ram Rai History हमारा भारत धर्म , आस्था , सम्प्रदाय , धार्मिक मान्यताओं और गुरु परम्परा का देश है।  देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र ज़मीन पर एक ऐसे ही महापुरुष के पांव जब पड़े तो गाथा ही नहीं एक स्वर्णिम इतिहास इतिहास बना। हम बात कर रहे हैं गुरु राम राय महाराज की जो  सातवीं पातशाही (सातवें सिख गुरु) श्री गुरु हर राय जी के पुत्र थे। गुरू हरराय साहिब ने अपने गुरूपद काल के दौरान बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया। मसंद, धीरमल एवं मिनहास जैसों ने सिख पंथ के प्रसार में बाधाएं उत्पन्न की। शाहजहां की मृत्यु के बाद गैर मुस्लिमों के प्रति शासक औरंगजेब का रूख और कड़ा हो गया।

एक आदर्श और पथ पदर्शक है गुरु राम राय की कहानी Sri Guru Ram Rai History

Sri Guru Ram Rai History मुगल शासक औरंगजेब ने सत्ता संघर्ष की स्थितियों में, गुरू हरराय साहिब जी द्वारा की गई दारा शिकोह की मदद को राजनैतिक बहाना बनाया। उसने गुरू साहिब पर बेबुनियाद आरोप लगाये। उन्हें दिल्ली में पेश होने का हुक्म दिया गया। गुरू हरराय साहिब जी ने रामराय जी को दिल्ली भेजा। उन्होंने सिख धर्म एवं गुरू घर के प्रति फैलायी गयी भ्रांतियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया।  कुछ यह भी लिखते हैं कि वहाँ पर उन्होने चमत्कार  भी दिखाये.यह कहा जाता है कि रामराय जी ने मुगल दरबार में गुरबाणी की त्रुटिपूर्ण व्याख्या की। यह सिखों के लिये निन्दनीय था।

जब गुरू हरराय साहिब जी को इस घटना के बारे में बताया गया तो उन्होने राम राय जी को तुरंत सिख पंथ से निष्कासित किया। राष्ट्र के स्वाभिमान व गुरुघर की परम्पराओं के विरुद्ध कार्य करने के कारण रामराय जी को यह कड़ा दण्ड दिया गया। इस घटना ने सिखों में देश के प्रति क्या कर्तव्य होने चाहिए, ऐसे भावों का संचार हुआ। सिख इस घटना के बाद गुरु घर की परम्पराओं के प्रति अुनशासित हो गए। इस प्रकार गुरू साहिब ने सिख धर्म के वास्तविक गुणों, जो कि गुरू ग्रन्थ साहिब जी में दर्ज हैं, गुरू नानक देव जी द्वारा बनाये गये किसी भी प्रकार के नियमों में फेरबदल करने वालों के लिए एक कड़ा कानून बना दिया। अपने अन्तिम समय को नजदीक देखते हुए उन्होने अपने सबसे छोटे पुत्र गुरू हरकिशन जी को ‘अष्टम्‌ नानक’ के रूप में स्थापित किया। कार्तिक वदी ९ (पांचवीं कार्तिक), बिक्रम सम्वत १७१८, (६ अक्टूबर १६६१) में कीरतपुर साहिब में ज्योति जोत समा गये।

जब गुरु हर राय जी ने रामराय जी को घर व पंथ से निष्कासित कर दिया तो जब रामराय जी अपनी संगत के साथ भ्रमण करते हुए १६७६ में देहरादून आये, इस हरी भरी घाटी ने उनका मनमोह लिया. तो औरंगजेब ने उन्हें देहरादून में रहने में सहायता करने के लिये गढवाल नरेश को कहा. गढवाल नरेश फतेह शाह ने रामराय जी को देहरादून में बहुत अधिक जमीन दे दी. औरंगजेब ने रामराय को हिंदू पीर की उपाधी दी। कहा जाता है कि जब रामराय जी देहरादून आये तो एक स्थान पर उनके घोड़े का खुर धंस गया. रामराय जी ने संगत को वहीं पर डेरा लगाने का निर्देश दिया और उस स्थान को अब खुड़बड़ा कहा जाता है. रामराय जी को जब अपना डेरा लगाने के लिये जमीन मिल गयी तो (जो देहरादून शहर के लगभग आधे क्षेत्रफल के बराबर है) उनका डेरा यहीँ बस गया और कहा जाता है कि इसी से आज हम और आप इस शहर को देहरादून के नाम से पुकारते हैं। .

गुरु रामराय जी ने यहाँ पर एक गुरुद्वारा “दरबार साहिब” बनाया. यहाँ पर विद्यार्थियों को निशुल्क संस्कृत व ज्योतिष शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी. गुरु रामराय साहिब ने उदासीन सम्प्रदाय की स्थापना की. जब गुरु रामराय जी ब्रह्मलीन हो गये. उनकी 4 पत्नियाँ थी पर कोई संतान न थी. उनके बाद उनका कार्यभार सम्भाला उनकी सबसे छोटी पत्नि माता पंजाब कौर ने लेकिन वे कभी गद्दी पर न बैठी. उन्होंने ही दरबार साहिब में महंत परम्परा प्रारम्भ की. महंत बनने के लिये शर्त यह है कि वह अविवाहित होना चाहिये व महंत बनने के पश्चात भी वह विवाह बंधन में नहीं बंध सकता, वह उत्तराखंड का ब्राहमण होना चाहिये.  उन्होंने गुरु रामराय मिशन बनाया. इन महंतों ने विषेशकर उत्तराखंड में शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया. आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिये यह वरदान से कम न था और न आज है। आज चिकित्सा शिक्षा और सामाजिक दायित्वों में एसजीआरआर एक मिसाल बन चूका है जहाँ देश भर के युवाओं का भविष्य तराशा जा रहा है वहीँ मेडिकल के  क्षेत्र में भी इस मिशन के प्रमुख और आध्यत्मिक महागुरु श्री महंत देवेंद्र दास जी और उनकी समर्पित टीम उन्हीं पदचिन्हों पर आगे बढ़ते हुए देश निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। आपको बता दें कि वर्तमान में महंत देवेंद्र दास जी इस परम्परा में दसवें महंत हैं। 

गुरु रामराय जी के देहरादून आने के उपलक्ष में 300 वर्षों से अधिक समय से एक मेला लगता है. इसे झंडे का मेला कहा जाता है. होली के पांच दिन बाद मेला लगता है. इसका प्रारम्भ झंडारोहण से होता है. उत्तराखंड के सुदूर गावों से इस मेले के दिन व झंडारोहण देखने के लिये लोग आते हैं. इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश हरियाणा व पंजाब तथा विदेशों से भी इस सम्प्रदाय के लोग आते हैं. यह झंडा एक बहुत बड़े सीधे पेड़ के तने का बना होता है. इस पर लपेटने के लिये कपड़े की बुकिंग 100 वर्ष तक पहुँच गयी है. लोग अपनी मन्नत के अनुसार उपर से और कपड़े भी लगाते हैं. उस दिन वहाँ पर तिल रखने की भी जगह नहीं होती है अंत में शाइनिंग उत्तराखंड न्यूज़ और उत्तराखंड सहित देश के हर नागरिक को भरोसा है की समाज के प्रति अपने समर्पण और युवा पीढ़ी के लिए श्री गुरु राम राय अपने इसी विजन को लेकर ऐसे ही आगे बढ़ता रहेगा।

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