Tesu Jhenjhi Marriage भारत में कई ऐसी लोक परंपराएं हैं, जिनमें धार्मिक मान्यताओं के साथ प्रेम, वीरता और लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। टेसू-झेंझी का विवाह भी ऐसी ही अनोखी परंपरा है। उत्तर प्रदेश के कई गांवों और कस्बों में दशहरे के बाद से ही इस प्रतीकात्मक शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बच्चे टेसू को दूल्हा और झेंझी को दुल्हन के रूप में सजाते हैं, घर-घर जाकर लोकगीत गाते हैं और शादी के लिए चंदा इकट्ठा करते हैं। शरद पूर्णिमा की रात दोनों का विवाह कराया जाता है।साल 2026 में टेसू-झेंझी का ब्याह 25 अक्टूबर, रविवार को शरद पूर्णिमा की रात मनाया जाएगा। इस दौरान कई जगहों पर बारात निकाली जाती है, मंगल गीत गाए जाते हैं और विवाह की पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं।
टेसू-झेंझी का ब्याह कब है Tesu And Jhanjhi Marriage
इनमें एक कहानी महाभारत के वीर बर्बरीक से जुड़ी है। लोकमान्यता के अनुसार, बर्बरीक ने युद्ध में जाने से पहले झेंझी से विवाह करने का वचन दिया था, लेकिन उनका शीशदान हो जाने के कारण यह वचन अधूरा रह गया। शरद पूर्णिमा पर दोनों का प्रतीकात्मक विवाह इसी अधूरे वचन और प्रेम की याद में कराया जाता है। आइए जानते हैं टेसू-झेंझी कौन थे, इनका विवाह क्यों होता है और शादी में कौन-कौन सी रस्में निभाई जाती हैं।

साल 2026 में टेसू और झेंझी का प्रतीकात्मक विवाह 25 अक्टूबर, रविवार को शरद पूर्णिमा की रात कराया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है। टेसू-झेंझी के विवाह की तैयारियां कई जगहों पर दशहरे के बाद शुरू होती हैं। बच्चे टेसू और झेंझी की आकृतियां तैयार करते हैं, उन्हें सजाते हैं और घर-घर जाकर लोकगीत गाते हुए शादी के लिए चंदा इकट्ठा करते हैं।शरद पूर्णिमा की रात इस आयोजन का मुख्य दिन होता है।इस दिन कुछ गांवों में बाकायदा बारात निकाली जाती है। वर पक्ष और वधू पक्ष के लोग बनते हैं। इसके बाद विवाह की रस्में पूरी की जाती हैं। हालांकि, आयोजन का तरीका अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है।

टेसू और झेंझी कौन थे
टेसू और झेंझी की पहचान को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लोककथाएं प्रचलित हैं। एक लोकप्रिय मान्यता में टेसू को महाभारत के वीर बर्बरीक का प्रतीक माना जाता है, जबकि झेंझी को उनकी प्रेमिका थीं। बर्बरीक महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। उन्हें अद्भुत युद्ध कौशल और दानवीरता के लिए जाना जाता है। महाभारत से जुड़ी कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी परीक्षा ली थी, जिसके बाद उन्होंने अपना शीश भगवान श्रीकृष्ण को दान में दे दिया था।
टेसू-झेंझी की लोककथा इसी प्रसंग को प्रेम और अधूरे वचन से जोड़ती है। इसके अनुसार, बर्बरीक ने युद्ध में जाने से पहले झेंझी से विवाह करने का वचन दिया था। युद्ध के दौरान शीशदान करने के कारण वे वापस नहीं लौट सके। उनकी प्रतीक्षा कर रही झेंझी के साथ उनका विवाह अधूरा रह गया।इसी लोकविश्वास के आधार पर शरद पूर्णिमा की रात टेसू और झेंझी का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है। हालांकि, बर्बरीक और झेंझी के प्रेम तथा विवाह का यह प्रसंग महाभारत की मूल कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय लोककथा के रूप में प्रचलित है।

दशहरे के बाद शुरू होती है शादी की तैयारी
टेसू-झेंझी का विवाह कई जगहों पर दशहरे के बाद शुरू होने वाला लोक उत्सव है। बच्चे टेसू और झेंझी की आकृतियां तैयार करते हैं और अपने-अपने समूह बनाते हैं। लड़के आमतौर पर टेसू को लेकर घर-घर जाते हैं, जबकि लड़कियां झेंझी के साथ लोकगीत गाती हैं। दोनों समूह शादी के लिए पैसे या अनाज इकट्ठा करते हैं। गांव के लोग भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करते हैं।यह गतिविधि कई दिनों तक चलती है। बच्चे गली-मोहल्लों में जाकर लोगों को उत्सव में शामिल करते हैं। शरद पूर्णिमा की रात इकट्ठा किए गए सहयोग से विवाह का आयोजन किया जाता है। इस परंपरा की खास बात यह है कि इसमें बच्चे केवल दर्शक नहीं होते, बल्कि पूरे आयोजन की तैयारी और रस्मों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

