Tulsi Vivah भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा बिना तुलसी के पत्तों के पूरी नहीं होती। इसके अलावा और भी बहुत से शुभ कामों में तुलसी के पत्तों का उपयोग किया जाता है। प्राचीन समय में हर घर में तुलसी का पौधा होना जरूरी मान माना जाता है। हर साल 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस मनाया जाता है। इस दिन तुलसी की पूजा विशेष रूप से की जाती है। तुलसी से जुड़ी एक रोचक कथा भी है, आगे जानिए तुलसी से जुड़ी ये रोचक कथा…
तुलसी को किसने दिया पौधा बनने का वरदान ?Tulsi Vivah

– शिवमहापुराण में तुलसी की कथा का वर्णन है। उसके अनुसार किसी समय शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था। शंखचूड़ बहुत पराक्रमी था, उसके सामने देवता भी नहीं टिक पाते थे। शंखचूड़ का विवाह धर्मध्वज की पुत्री तुलसी से हुआ था। तुलसी पतिव्रता स्त्री थी, जिसके चलते शंखचूड़ का पराक्रम और बढ़ गया।
– शंखचूड़ ने अपने पराक्रम से स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें महादेव के पास जाने को कहा। महादेव शंखचूड़ से युद्ध के लिए तैयार हो गए। देवता और दैत्यों की सेना युद्ध भूमि में आमने-सामने आ गई और दोनों के बीच भयंकर युद्ध होने लगा

जब महादेव ने शंखचूड़ को मारने अपना त्रिशूल उठाया, तभी आकाशवाणी हुई ‘जब तक शंखचूड़ की पत्नी तुलसी का सतीत्व अखंडित है, तब तक इसका वध संभव नहीं होगा।’ आकाशवाणी की बात सुनकर भगवान विष्णु शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी के पास गए और उसका सतीत्व खंडित कर दिया।ऐसा होते ही महादेव ने शंखचूड़ का वध कर दिया। सच्चाई जानकर तुलसी बहुत दुखी हुई और उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया।

भगवान विष्णु ने वो श्राप स्वीकार किया और कहा ‘तुम धरती तुलसी के पौधे रूप में अवतार लोगी। मेरी पूजा में तुलसी का उपयोग विशेष रूप से होगा।’ तभी से तुलसी के पौधे को हिंदू धर्म में बहुत विशेष माना गया है। भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के भोग में तुलसी के पत्ते जरूर डाले जाते हैं। इनके मंत्रों के जाप में तुलसी की माला का ही उपयोग किया जाता है। हर देवउठनी एकादशी पर तुलसी और शालिग्राम का विवाह करवाया जाता है।

