Uttarakhand Agriculture उत्तराखंड में 25 साल में 27% जमीन हुई गायब

Uttarakhand Agriculture  उत्तराखंड में साल 2025 खेती-किसानी के लिहाज से निराशाजनक साबित हुआ है। सरकारी आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि राज्य में अधिकांश प्रमुख फसलों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। खासतौर पर गढ़वाल मंडल में यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। सीमित संसाधन, घटती कृषि भूमि और बढ़ती लागत के बीच किसान लगातार हतोत्साहित हो रहे हैं।राज्य की बड़ी आबादी आज भी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है, लेकिन बदलते मौसम, जंगली जानवरों का बढ़ता खतरा, सिंचाई सुविधाओं की कमी और योजनाओं का अपेक्षित लाभ न मिल पाने से खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है।

अदरक, मटर और चावल में भी गिरावट  Uttarakhand Agriculture



कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में आलू का कुल उत्पादन 1 लाख 29 हजार 920 मीट्रिक टन रहा। यह 2024 से थोड़ा बेहतर जरूर है, लेकिन 2022 के मुकाबले करीब 23 हजार मीट्रिक टन की गिरावट दर्ज की गई है। इसी तरह दालों का उत्पादन भी घटकर 48 हजार 56 मीट्रिक टन रह गया, जो तीन साल पहले के मुकाबले लगभग 9 हजार मीट्रिक टन कम है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ा है।
आलू और दालों के अलावा अदरक, मटर, चावल जैसी कई फसलों में भी उत्पादन कमजोर रहा है। खासतौर पर गढ़वाल क्षेत्र में नकदी फसलों का उत्पादन तेजी से घटा है। किसानों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बनाई गई योजनाएं जमीनी स्तर पर प्रभावी साबित नहीं हो पा रही हैं।

गेहूं में राहत, चावल में फिर निराशा
जहां गेहूं के उत्पादन में कुछ राहत देखने को मिली है। साल 2025 में गेहूं का उत्पादन बढ़कर 9 लाख 39 हजार मीट्रिक टन पहुंचा, वहीं चावल के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई। 2022 के मुकाबले 2025 में चावल का उत्पादन करीब डेढ़ लाख मीट्रिक टन कम हो गया।

तेजी से घट रही कृषि भूमि
प्रदेश के लिए सबसे बड़ी चिंता घटती कृषि भूमि है। कृषि मंत्री गणेश जोशी के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में राज्य की करीब 27 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि खत्म हो चुकी है। राज्य गठन के समय जहां 7.70 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि थी, वह अब घटकर लगभग 5.68 लाख हेक्टेयर रह गई है। विकास कार्यों और शहरीकरण ने खेती को बड़ा नुकसान पहुंचाया है।


सिंचाई और जंगली जानवर बड़ी चुनौती
राज्य की कुल कृषि भूमि में से केवल 3.53 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। पर्वतीय क्षेत्रों में बारिश पर निर्भर खेती मौसम की मार झेल रही है। वहीं, बंदर, सूअर, हाथी जैसे जंगली जानवर किसानों की फसलों और पशुपालन को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।किसानों का कहना है कि अगर समय रहते ठोस नीतिगत फैसले, सुरक्षा, उचित मूल्य और आधुनिक सुविधाएं नहीं दी गईं, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की खेती और अधिक संकट में चली जाएगी। खेती को बचाने के लिए अब बड़े और प्रभावी कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।