Jaunsar Bawar ये तो आप भी जानते होंगे कि, उत्तराखंड में प्राचीन काल से कई जनजाति निवास कर रही है-आज हम आपको सूबे की सबसे बड़ी जनजाति के बारे में बतायंगे जिसे जौनसारी कहते हैं, जौनसारी जनजाति उत्तराखंड की एक प्रमुख जनजाति है। यहां के लोगों में आपसी मेलजोल भी काफी शानदार हैं और जौनसारी जनजाति की ये भी एक विशेषता हैं। बेहद ईमानदार किस्म की जनजाति मानी जाने वाली ये दुनिया आज भी दूसरे इलाकों की जैसी जुर्म की दुनिया से अछूता हैं… यहाँ का पहनावा यहाँ का जीवन यापन करने का तरीका बेहद अलग हैं और साथ ही यहां की होने वाली शादिया भी कुमाऊं और गढ़वाल में होने वाली शादियों से काफी भिन्न देखी जाती हैं।
एक अलग अनोखी संस्कृति है जौनसारी Jaunsar Bawar

सबसे पहले बात करते है जौनसारी शादी में होने वाले जोजड़ा रिवाज की : आपको बता दें यहाँ शादी का तरीका काफी अलग होता हैं … जौनसार भाबर में एक अद्भुत परंपरा का निर्वहन आज भी होता है। जहाँ दुल्हन बारात लेकर दूल्हे के घर आती है। खास बात ये है कि सुबह के वक्त दुल्हन अपने साथ अपने परिवार के चार लोगो की बारात को लेकर दूल्हे के घर पहुंचती है। इसके साथ ही शादी की रस्म पूरी की जाती हैं। ख़ास बात ये हैं की इन शादियों में दहेज का बिल्कुल भी प्रावधान नहीं है।
मेहंदी की रात लगभग 7 से 8 बजे के बीच लड़के के मामा के गाँव घर से लगभग 8 या 10 लोग आते है जोजड़ा में हमेशा बड़े लड़के की शादी ही बहुत धूम धाम से मनाई जाती है जिसमें रयिणी जिमाई जाती हैं और तोहफे के तौर पर परिजन लोग बकरा लेकर आते हैं जो की अनिवार्य माना जाता है जिनका फूल मालाओ के साथ जोरदार स्वागत होता है। गाँव के बाजगी यानी (ढोल बजाने वाले) शबत यानी (स्वागत के लिए बजाये जाने वाली धुन) द्वारा उन सभी मेहमानों का स्वागत किया जाता है बदले मे मेहमानों द्वारा बजगियो को कुछ रुपये उनके ढोल के ऊपर उपहार स्वरूप रखे जाते है।

इसके तुरंत बाद दूल्हे के मामा की और से पूरे आँगन मे हारुल गीत लगाए जाते है जिसमें गाँव के सभी लोग सम्मिलित होते है। अगली सुबह पंडित जी के मुहूर्त के अनुसार हल्दी हाथ का कार्यक्रम वर और वधु के घर पर धूमधाम से होता है। वही. दूल्हे को सेहरा पहनाने का अधिकार केवल मामा को ही होता है … बारात प्रस्थान से पहले यहाँ तांदी नृत्य किया जाता है …..
अब दुल्हन के यहाँ पहुंचने पर बरात का स्वागत किया जाता है जिसके बाद वरमाला की रस्म होती है, इसके बाद अगली रस्म में जहां वधु को वर के परिवार द्वारा लाये गए स्वर्णाभूषण पहनाकर सुशोभित किया जाता है। अब समय दुल्हन की विदाई का :अब आती है फेरों की रस्म, जहाँ वर वधु एक दूसरे को सात फेरों के साथ वचन देते है और फिर फेरों में सिन्दूर, मंगलसूत्र, पहनाकर वधु को सुहागन किया जाता है …..जिसके बाद वधू पक्ष के लोग शगुन के नाम पर मात्र पांच बर्तन बेटी को दे कर भरे मन से विदाई देते हैं …..
अब जानते है ‘रैणिया जिमाना’ परम्परा के बारे में :

रैणिया जिमाना’के लिए सभी को निमंत्रण एक खास व्यक्ति देता है , जोकि ढ़ाकी कहलाता है यह गॉंव के लोगो को शादी का आमंत्रण देता है। शादी के अच्छे से संपूर्ण हो जाने की खुशी मे गाँव में यहां ‘रैणिया जिमाई ’ जाती हैं… वधू या वर के साथ आए बाराती वाद्य यंत्रों के साथ नाचते गाते हुए वर या वधु के गांव से कुछ दूर ठहर जाते हैं। जहाँ बाराती रुकते है उस जगह को डेरा कहा जाता है जिसमें बराती द्वारा रात भर नाच गाना चलता रहता है, जिसे स्थानीय बोली में बित्तर गायण कहते हैं। दूसरे दिन वर पक्ष के आंगन में हारुल, झेंता, रासो व जगाबाजी जैसे लोकगीत और नृत्यों का आयोजन होता है।

शादी के लिए विशिष्ट है ‘सुंवार बियाई ’ :
आज आधुनिकता के साथ वक़्त थोड़ा बदल गया है लेकिन पहाड़ों की संस्कृति और परम्परा में ज्यादा असर नहीं पड़ा है। जौंसाब भावर में आज भी पारम्परिक नृत्य और पुराने वाद्ययंत्रों यानी ढ़ोल-दमाऊ ,रणसिंघा संगीत के लिए प्रयोग किये जाते हैं, दुल्हन अपने पारंपरिक वेशभूषा और गाँव की महिलाएं भी (घागरा-कुर्ती) जौनसार भाबर की पारंपरिक वेशभूषा पहनकर नृत्य करते है और इस तरह एक जौनसारी शादी का सफ़ल आयोजन होता है…..

