Special Story By : Anita Tiwari , Dehradun
Jeolikot : उत्तराखंड …. एक अद्भुत राज्य … प्रकृति के खूबसूरत नज़ारों से देश दुनिया के सैलानियों को आकर्षित करती देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती …. कुमाऊँ का एक छोटा सा गांव जिसका नाम है ज्योलिकोट History of Jeolikot में हम आपको रोचक बातें बता रहे हैं।
Jeolikot पहुंचने का ये है आपके लिए पूरा ज्ञान –

Jeolikot-
- रोड मार्ग: दिल्ली के ISBT आनंद विहार से आपको नैनीताल या काठगोदाम जाने वाली बस मिल जाएँगी। काठगोदाम से आपको ज्योलिकोट के लिए छोटी गाड़ियाँ लेनी होंगी।
- रेल मार्ग: सबसे नज़दीक रेलवे स्टेशन काठगोदाम में है जो की ज्योलिकोट से 20 कि.मी. दूर है। रेलवे स्टेशन के बाहर से ही आपको ज्योलिकोट जाने वाली गाड़ियाँ मिल जाएँगी।
- हवाई मार्ग: 55 कि.मी. की दूरी पर पंतनगर हवाईअड्डा ज्योलिकोट से सबसे नज़दीक हवाईअड्डा है। पंतनगर से ज्योलिकोट के लिए आपको 600-1000 रुपए में टैक्सी मिल सकती हैं।
कैसा था एक शताब्दी पहले ये छोटा सा गाँव?

1906 में सी. डब्लू .मर्फी द्वारा लिखी गई किताब गाइड टू नैनीताल एंड कुमाऊँ में पहली बार Jeolikot का ज़िक्र हुआ। उस समय सीमित साधनों के कारण यह उन कुछ किताबों में से थी जिसमें काठगोदाम से नैनीताल के सफर में काम आने वाली सभी बातों के बारे में बताया था।अब
सुनिए ज्योलिकोट के रखवाले भूत की कहानी
कहानी शुरू करने से पहले ही आपको बता दूँ की ये बस गांव वालों की कही-सुनी बातें हैं। इस कहानी का कोई ठोस प्रमाण तो नहीं हैं पर अगर आप Jeolikot जाएंगे तो कोई ना कोई आपको इस विचित्र घटना के बारे में बता ही देगा।ये 19वी शताब्दी की बात है जब लेफ्टिनेंट कर्नल Colonel Warwick वॉर्विक नाम के एक अंग्रेजी अफसर ज्योलिकोट आए थे। उस समय में ज्योलिकोट एक छोटा सा गाँव था जहाँ पर Nainital जाते हुए अंग्रेजी अफसर और उनके घोड़े कुछ देर सुस्ताते थे। यहाँ पर रुके वॉर्विक साहब को एक स्थानीय लड़की से प्यार हो गया और कर्नल साहब यहीं के होकर रह गए।

उन्होंने गाँव की उस महिला से शादी रचाई और [Jeolikot ]ज्योलिकोट में एक घर भी बनाया। शादी के कुछ सालों बाद वार्विक साहब की पत्नी का देहांत हो गया और 20 कमरों के इस घर में वो अकेले रहने लगे। ना नौकरों को अंदर आने की इजाज़त थी और गाँव वाले अगर पास से भी गुज़रते तो उनको धुत्कार कर भगा दिया जाता।इस दौरान गाँव वालों ने यहाँ हो रही अजीबोगरीब गतिविधियों पर ध्यान दिया। हर रात अँधेरा होते ही उनको एक औरत दिखा करने लगी जो की घोड़े पर सवार होकर गाँव भर में घूमती थी। लोग घर के अंदर भी रहते तो उनको घोड़े के सरपट दौड़ने की आवाज़ आती। थोड़ी छानबीन के बाद पता चला की वो वॉर्विक साहब ही थे जो अपनी मृत पत्नी के कपड़े और गहने पहन कर रोज़ घोड़े पर सवार गाँव के चक्कर काटते।

क्योंकि Jeolikot गाँव वालों को इस अंग्रेज़ अफसर से हमदर्दी थी इसलिए उन्होंने कर्नल वॉर्विक को कभी नहीं रोका। धीरे-धीरे लोग ये भी मानने लगे की घोड़े पर सवार औरत के भेस में वॉर्विक रात को डाकुओं से गाँव वालों की रक्षा करता है और जंगली जानवरों से उनके खेतों को बचाता। इस घटना के सालों बाद आज भी रातों को ज्योलिकोट में घोड़े की हिनहिनाने और सरपट दौड़ने की आवाज़ें आती हैं। लोग आज भी वॉर्विक को ज्योलिकोट का रखवाला भूत बुलाते हैं।
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