Bageshwar Uttarayani mela: पहाड़ों में ख़ास कर कुमायूं रीजन में उत्तरायणी मेला का बड़ा सांस्कृतिक महत्व है. उत्तराखंड में इस त्योहार को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है. गढ़वाल में जहां मकर संक्रांति को मकरैणी (Makrani) और खिचड़ी सज्ञान (Khichadi) के रूप में मनाया जाता है. वहीं कुमाऊं क्षेत्र में इस दिन को उतरैणी और घुघुति सज्ञान (Ghughuti Sagyan) कहा जाता है. जहां गढ़वाल में इस दिन खिचड़ी का महत्व है, वहीं कुमाऊं क्षेत्र में इस दिन आटे, चीनी, सौंफ आदि के मिश्रण से बने घुघुति बनाई और खाई जाती हैं. इस दिन प्रात: पवित्र नदियों में स्नान का भी महत्व है. उत्तराखंड में उत्तरायणी के अवसर पर मेलों का भी पुराना इतिहास रहा है.
Bageshwar Uttarayani mela बागेश्वर का उत्तरायणी मेला

- Bageshwar Uttarayani mela उत्तराखंड में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों हिस्सों में मकर संक्रांति के अवसर पर मेलों का आयोजन होता है. गढ़वाल के गिंडी मेले और कुमाऊं के उत्तरायणी मेले खासे मशहूर रहे हैं. यह मेले पूर्व में भी धार्मिक, आध्यात्मिक आजादी और उत्तराखंड आंदोलन की अलख जगाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं. खासतौर पर कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर में लगने वाले उत्तरायणी मेली की तो बात ही कुछ और है. इसी तरह पौड़ी गढ़वाल में डाडामंडी मेला भी खूब मशहूर है. लोग बड़ी ही बेसब्री से इन मेलों का इंतजार करते हैं. आधुनिक युग में इन मेलों की रौनक कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन पूर्व में ये मेले व्यापार, आध्यात्मिक सामाजिक चेतना के गढ़ हुआ करते थे. देवभूमि में नैनीताल, चंपावत, हरिद्वार, पौड़ी, रुद्रप्रयाग आदि जगहों पर भी उत्तरायणी मेलों का आयोजन होता है.

- Bageshwar Uttarayani mela बागेश्वर में सरयू और गोमती नदी के तट पर हर वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर उत्तरायणी मेला आयोजित किया जाता है. यहां भगवान शिव का बागनाथ मंदिर भी है. मान्यता है कि इस दिन बागेश्वर के इस संगम पर स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है. बागेश्वर का उत्तरायणी मेला एक हफ्ते तक चलता है. इस अवसर पर यहां भारी संख्या में लोग स्नान और मेला देखने को पहुंचते हैं. हालांकि, कोविड से जुड़े प्रतिबंधों के चलते यहां रौनक कम होगी.

ऐतिहासिक होगा उत्तरायणी मेला – मुख्यमंत्री
- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि देश दुनिया तक उत्तरायणी पर्व की चमक दिखाई जाएगी और इस मौके पर सौर ऊर्जा के प्रति जन जागरूकता के लिए इससे संबंधित योजनाएं लांच की जाएंगी । बागेश्वर में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा जिसमें लोक गीत, लोक नृत्य एवं अन्य आयोजन भी होंगे । इस पर्व पर उत्तराखण्ड की प्रमुख हस्तियों को भी सांस्कृतिक संध्या के लिए आमंत्रित किया जाएगा । संगमों पर भव्य आरती की व्यवस्था भी की होगी और हस्तशिल्प एवं फूड फेस्टिवल का आयोजन भी किया जाएगा ।
Bageshwar Uttarayani mela बागेश्वर के उत्तरायणी का महत्व

- Bageshwar Uttarayani mela बागेश्वर में प्राचीन बागनाथ मंदिर के पास सरयू और गोमती नदी के अलावा गुप्त भागीरथी के संगम पर उत्तरायणी मेले का आयोजन किया जाता है. इस मेले में कई सांस्कृति आयोजन होते हैं, यह व्यापार का केंद्र भी होता है. यहां स्नान का विशेष महत्व है. इस अवसर पर श्रद्धालु यहां जनेऊ संस्कार, मुंडन आदि के लिए भी पहुंचते हैं. उत्तराखंड के तराई क्षेत्र से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु उत्तरायणी मेले का हिस्सा बनने के लिए हर वर्ष यहां पहुंचते हैं. यहां पर कई छोटे-छोटे नाटक और नृत्य पेश किए जाते हैं. स्थानीय कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी सांस्कृतिक विरासत के दर्शन कराते हैं.

- Bageshwar Uttarayani mela ऐतिहासिक दृष्टि से बात करें तो बागेश्वर का यह मेला स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी लोगों में स्वतंत्रता की अलख जगाने का काम करता था. उत्तराखंड आंदोलन के समय भी आंदोलनकारी इस मेले के जरिए एकजुट होते थे. बागेश्वर में बागनाथ मंदिर का निर्णाण कुमाऊं क्षेत्र के चंद्रवंशी राजा लक्ष्मी चंद ने सन 1602 में करवाया था. हालांकि, यहां 7वीं सदी से लेकर 16वीं सदी तक की मूर्तियां हैं. मान्यता है कि मार्कंडेय ऋषि यहीं रहा करते थे और भगवान शिव एक बाघ के रूप में इसी क्षेत्र में विचरण करते थे, जिस कारण इस जगह का नाम बागेश्वर पड़ा.
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