Blue Eyed White Tiger देहरादून जू में इन दिनों दुर्लभ सफेद बाघ लाया गया है। ढाई साल का (छोटा शावक) तेजस ग्वालियर से लंबा सफर तय करके यहां पहुंचा है। तेजस को एनिमल एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत देहरादून लाया गया है। इसके बदले करीब पांच साल के रॉयल बंगाल टाइगर भोला को ग्वालियर जूलॉजिकल पार्क भेजा गया। तेजस ने ग्वालियर से देहरादून तक करीब 550 किलोमीटर का सफर तय किया। उसके साथ 13 सदस्यों की एक खास पशु चिकित्सा टीम भी मौजूद थी।
नए बाडे में पहुंचते ही एक्टिव हुआ तेजस Blue Eyed White Tiger

देहरादून पहुंचते ही तेजस ने अपने नए बाडे को देखना और समझना शुरू कर दिया। उसने आसपास की जगह देखी, हवा सूंघी और बाडे के किनारे घूमता रहा। क्वारंटीन पूरा होने के बाद टूरिस्ट को तेजस के साथ आम रंग वाले रॉयल बंगाल टाइगर को भी अलग-अलग बाडों में देखने का मौका मिल सकता है। इससे लोग बाघों के अलग-अलग कलर और नेचुरल डाइवर्सिटी को पास से देख सकेंगे।

अलग प्रजाति नहीं है सफेद बाघ
सफेद बाघ कोई अलग प्रजाति या नस्ल नहीं है। उसका सफेद रंग एक दुर्लभ आनुवंशिक विशेषता के कारण होता है। अल्बिनो जानवरों के विपरीत सफेद बाघों के शरीर पर धारियां बनी रहती हैं। यह बंगाल टाइगर में पाई जाने वाली प्राकृतिक रंग विविधता है।
आठ साल बाद बक्सा में फिर गूंजेगी बाघ की दहाड़
पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार स्थित बक्सा टाइगर रिजर्व में आठ साल बाद स्थायी बाघ आबादी बसाने की मुहिम शुरू हो गई है। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई तीन वर्षीय रॉयल बंगाल बाघिन को शुक्रवार को प्राकृतिक घेरे में छोड़ा गया। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र यादव और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी में शुरू हुआ यह बंगाल का पहला बाघ पुनर्वास कार्यक्रम है।

बाघिन को फिलहाल सॉफ्ट रिलीज के तहत प्राकृतिक घेरे में रखा गया है। यहां उसके स्वास्थ्य, शिकार क्षमता और व्यवहार की निगरानी होगी।देहरादून जू को पहले मालसी डियर पार्क के नाम से जाना जाता था। यह मसूरी रोड पर शिवालिक रेंज की तलहटी में बना है और इसे मिनी जूलॉजिकल पार्क के तौर पर डेवलप किया गया है।यह देहरादून के क्लॉक टावर से करीब 9-10 KM दूर मसूरी जाने वाले रास्ते पर पड़ता है। यहां आने वाले टूरिस्ट अक्सर मसूरी, हरिद्वार और ऋषिकेश भी जाते हैं।

