स्पेशल रिपोर्ट : अनीता तिवारी , देहरादून

Butter Festival 2022 हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी तमाम परंपराएं और रीति रिवाज है जो आज भी विज्ञान और डिजिटल युग में लोगों के लिए रोमांच और आनंद का सबसे बड़ा जरिया बनती है। देवभूमि उत्तराखंड में भी आपको कदम कदम पर अद्भुत अनोखे और रोमांच से भरपूर आयोजन , रिवाज़ और रस्में निभाती परंपराएं मिलेंगी जो आज भी बेहद लोकप्रिय और मशहूर है।
Butter Festival 2022 क्या है आयोजन से तात्पर्य

- Butter Festival 2022 हर साल ‘अंडूड़ी’ मनाने यहां आए लोगों को रैथल से सात किलोमीटर की पैदल चढ़ाई चढ़ने के बाद दयारा तक पहुंचना होता है. यह घास का एक मैदान है. ऐसे मैदानों को बुग्याल कहा जाता है. ‘अंडूड़ी’ मुख्यतः दयारा बुग्याल में ही मनाया जाता है. रैथल से दयारा की ओर करीब चार किलोमीटर चलने पर एक बेहद खूबसूरत बस्ती है. गोही नाम की इस बस्ती में करीब 14-15 कच्चे घर हैं. इन घरों को स्थानीय लोग ‘छानी’ कहते हैं…अंडूड़ी के दिन दयारा की सभी छानियों के बाहर रंगबिरंगे फूल सजाए जाते हैं. इन फूलों के साथ ही छानियों के बाहर एक पूरी भी टांगी जाती है. फिर एक व्यक्ति जाकर इस पूरी को उतारता है और तब बाकी लोग मिलकर उस पर मट्ठे की पिचकारियां मारना शुरू करते हैं.

- Butter Festival 2022 कुछ समय पहले तक बेहद कम लोग ही इस अनोखे उत्सव के बारे में जानते थे. हालांकि इसकी जानकारी आज भी कम ही लोगों को है लेकिन अब यह इतना तो प्रचारित हो ही गया है कि दूसरे राज्यों से भी कुछ लोग इसमें हिस्सा लेने पहुंचने लगे हैं.समुद्रतल से 11 हजार फीट की ऊंचाई पर फैले दयारा बुग्याल में रैथल के ग्रामीण सदियों से भाद्रप्रद महीने की संक्रांति को दूध, मक्खन, मट्ठा की होली खेलते आ रहे हैं। आज़ादी के अमृत महोत्सव वर्ष में रैथल पर्यटन उत्सव समिति ने इस वर्ष 17 अगस्त को पारंपरिक बटर फेस्टिवल के आयोजन का निर्णय लिया है। इस आयोजन में ग्रामीण देश-विदेश से आने वाले मेहमानों के साथ 17 अगस्त को मक्खन-मट्ठा की होली खेलेंगे।

- Butter Festival 2022 रैथल के ग्रामीण गर्मियों की दस्तक के साथ ही अपने मवेशियों के साथ दयारा बुग्याल समेत गोई चिलापड़ा में बनी अपनी छानियों में ग्रीष्मकालीन प्रवास के लिए पहुंच जाते हैं। जहां ऊंचे बुग्यालों में उगने वाली औषधीय गुणों से भरपूर घास व अनुकूल वातावरण का असर दुधारू पशुओं के दुग्ध उत्पादन पर भी पढ़ता है। ऐसे में ऊंचाई वाले इलाकों में सितंबर महीने से होने वाली सर्दियों की दस्तक से पहले ही ग्रामीण लौटने से पहले अपनी व अपने मवेशियों की रक्षा के लिए प्रकृति का आभार जताने के लिए इस अनूठे पर्व का आयोजन करते हैं।
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