समानता, और सद्भाव कायम करेगा यूसीसी – स्वामी चिदानन्द
सब समान, सबका सम्मान यही है भारत का संविधान
समान नागरिक संहित सियासत का नहीं विरासत का विषय

Chidanand on UCC जिस यूसीसी कानून में लिव इन के बारे में विधान सभा से लेकर देश भर में चर्चा हो रही है उस पर देश के बड़े संत और परमार्थ निकेतन के प्रमुख स्वामी चिदानंद का बड़ा बयान आया है जिसमे उन्होंने लिव इन को अनुबंध नहीं संबंध बताया है। उत्तराखंड में यूनिफाॅर्म सिविल कोड विषय पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने युवा मुख्यमंत्री, उत्तराखंड पुष्कर सिंह धामी और प्रदेशवासियों को यूनिफाॅर्म सिविल कोड के लिये बधाईयाँ दी। उन्होंने कहा कि राष्ट्र एक नई करवट ले रहा है ऐसे में दढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति की जरूरत है।
धामी ने कमाल कर दिया; धमाल मचा दिया Chidanand on UCC

स्वामी जी ने जनसंख्या नियंत्रण कानून पर चर्चा करते हुये कहा कि हमारे पास प्राकृतिक संसाधन सीमित है और जनसंख्या वृद्धि से संसाधनों पर जोर पड़ रहा है, समय से पहले समाप्त हो रहे हैं इसलिये एक सख्त कानून की जरूरत है। अब समय आ गया कि ’’हम दो हमारे दो और सब के दो! जिसके दो उसी को दो’’ नहीं तो हमारी आगे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। इस अवसर पर उन्होंने वाणी प्रदूषण, विचार प्रदूषण और वायु प्रदूषण न फैलाने का संदेश देते हुये कहा कि भारत शौर्य के साथ धैर्य की भी भूमि है। इस समय भारत की विशालता को भारत की दृष्टि से देखने की जरूरत है।
समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में किया गया है, जो राज्य की नीति के निदेशक तत्व के अन्तर्गत है। जिसमें कहा गया है कि ‘‘राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।’’ यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है कि हर धर्म, जाति, संप्रदाय, वर्ग के लिए पूरे देश में एक ही नियम। दूसरे शब्दों में कहें तो समान नागरिक संहिता का मतलब है कि पूरे देश के लिए एक समान कानून का होना।
यूसीसी लागू करने से राष्ट्रीय अखंडता और लैंगिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा। यह धार्मिक स्वतंत्रता और विविधता के लिये खतरा नहीं है बल्कि इससे एकता, एकरूपता और सद्भाव के वातावरण का निर्माण होगा। समान नागरिक संहिता से पूरे देश के लिये एक समान कानून के साथ ही सभी धार्मिक समुदायों के लिये विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि कानूनों में भी एकरूपता प्रदान होगी और धार्मिक विभाजन को कम करने में मदद मिलेगी, परस्पर विश्वास प्रगाढ़ होगा, धार्मिक रूढ़िवादिता के बजाय लोकहित के कार्य होगे।
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