Special Story By – Anita Ashish Tiwari , Dehradun
History of Tungnath देवभूमि उत्तराखंड के कण कण में देवों का वास है। धार्मिक आस्था , मान्यताओं और पौराणिक धामों की लम्बी शृंखला यहाँ दुनियभर के हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए कौतुहल और आस्था का केंद्र है। इसी कड़ी में आज बात करेंगे पौराणिक तुंगनाथ धाम की –

History of Tungnath भगवान शिव के बाहु की होती है तुंगनाथ में पूजा
- History of Tungnath रूद्रप्रयाग जिले में स्थित तुंगनाथ मंदिर पहाड़ों की चोटी के बीच बसा हुआ प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर 1000 साल पुराना है और शिवजी को समर्पित है। समुद्र तल से 3680 मीटर की उंचाई पर स्थित इस मंदिर का निर्माण पांडवो ने करवाया था। यह मंदिर बहुत ही सुन्दर वास्तुकला से निर्मित है और इसके आसपास अनेकों मंदिर है जोकि बहुत ही अद्भुत है। बरसात के दिनों में इस मंदिर से शिवजी की मूर्ति को हटा कर तुंगनाथ मंदिर चोपता में स्थापित किया जाता है और बरसात समाप्त होने पर पुनः ढोल और बाजों के साथ तुंगनाथ मंदिर में शिवजी की मूर्ति स्थापित कर दी जाती है।

- History of Tungnath तुंगनाथ मंदिर अप्रैल-मई में खोले जाते है और दिवाली के बाद बंद कर दिए जाते है। यदि आप भी तुंगनाथ मंदिर के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो शाइनिंग उत्तराखंड न्यूज़ के इस लेख को ध्यान से पढ़े –
![]()
- माना जाता है कि पांडवों ने कुरुक्षेत्र युद्ध में अपने चचेरे भाइयों की हत्या करने के बाद भगवान शिव को खोजने के लिए अपनी यात्रा शुरू की थी। भगवान शिव सभी मौतों से नाराज़ थे, इसलिए वह पांडवों से बचना चाहते थे जिसके परिणामस्वरूप वह एक बैल के रूप में बदल गये थे और उनके शरीर के सभी अंग अलग-अलग जगहों पर बिखर गए। History of Tungnath उनका कूब केदारनाथ में, तुंगनाथ में बहू, रुद्रनाथ में सिर, मध्यमाश्वर में नाभि और कल्पेश्वर में जटा दिखाई दिया। पांडवों द्वारा भगवान शिव की पूजा करने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस स्थान पर एक मंदिर तुंगनाथ मंदिर बनाया गया था।

- History of Tungnath तुंगनाथ महादेव मंदिर उत्तराखंड की संरचना बहुत ही अद्भुत है। पत्थरों से सजा हुआ यह मंदिर बहुत ही आकर्षक दिखाई देता है। मंदिर में प्रवेश करते ही नंदी बाबा की पत्थर की मूर्ति है जोकि महादेव की तरफ मुख किये हुए है। मंदिर की छत को पत्थरों से बनाया गया है और सबसे ऊपर लकड़ी का एक गुंबद है जिसमे 16 छेद है। ऊँची मीनारों से चित्रित इस विशाल मंदिर में भगवान शिव की अनुपम मूर्ति स्थापित है और साथ ही पांडवों के चित्र भी उपस्थित है। मंदिर के प्रवेश द्वार के दाई और गणेश जी की मूर्ति भी स्थापित है…

- अगर आप तुंगनाथ मंदिर दर्शन के लिए जा रहे है तो हम आपको बता दे कि मंदिर के अन्दर फोटोग्राफी वर्जित है।
- तुंगनाथ मंदिर कि यात्रा के दोरान आप ट्रैकिंग जूते, सर्दियों की जैकेट, सनस्क्रीन, पानी और नियमित दवाईयां अवश्य साथ ले कर चले।
- तुंगनाथ मंदिर कि यात्रा के दोरान बर्फ पर फिसलने की उच्च संभावना रहती है इसीलिये वाटरप्रूफ ट्रेकिंग जूते साथ ले और आप ट्रेक के दौरान अतिरिक्त सहायता के लिए एक छड़ी भी साथ ले जा सकते हैं।
- ट्रेक रूट पर कोई चार्जिंग पॉइंट उपलब्ध नहीं हैं। इसीलिए आप अपने मोबाइल फोन को चार्ज करने के लिए अपने साथ पावर बैंक ले जा सकते हैं।

History of Tungnath भगवान राम से इसलिए जुड़ा है तुंगनाथ
- History of Tungnath पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चंद्रशिला पहुंचकर आप विराट हिमालय की सुदंर छटा का आनंद ले सकते हैं।
must read this informative story – https://shininguttarakhandnews.com/migration-in-uttarakhand/

