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  •  Turiya Consciousness चेतना की चौथी अवस्था तुरीय का रहस्य

 Turiya Consciousness चेतना की चौथी अवस्था तुरीय का रहस्य

September 9, 2026
admin

Turiya Consciousness चेतना, एक आत्मा को मानव शरीर से जोड़ने का काम करता है। बिना चेतना के एक मनुष्य के लिए खुद के अस्तित्व को समझ पाना नामुमकिन है। अध्यात्म में भगवान् शिव को चेतना का स्वरूप माना गया है, जो मनुष्य के आज्ञा चक्र में विराजमान हैं और शरीर में मौजूद प्राणशक्ति को मार्ग दिखाते हैं। अध्यात्म में चेतना को चार अवस्थाओं में बांटा गया है – जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय

तुरीय अवस्था की क्या विशेषताएं हैं Turiya Consciousness


पहली तीन अवस्थाओं का अनुभव हम रोजमर्रा के जीवन में करते हैं, लेकिन तुरीय अवस्था को सामान्य अनुभव से परे चेतना की ऐसी स्थिति माना गया है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर, मन या विचारों तक सीमित नहीं समझता। तुरीय अवस्था चेतना की चौथी और सर्वोच्च अवस्था है। यह न जाग्रत है, न स्वप्न है, न गहरी नींद है, बल्कि इन सबके पार जाकर आत्मा और ब्रह्म के अद्वैत अनुभव की स्थिति है। इसे प्राप्त करना ही योग और ध्यान का परम लक्ष्य माना गया है।

‘तुरीय’ संस्कृत के ‘तुर्य’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है – चौथा। इसे चौथी अवस्था इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद की तीन अवस्थाओं से अलग है। यह इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी मानी जाती है। इसमें साधक शुद्ध आत्मा और ब्रह्म का अनुभव करता है। चेतना की जाग्रत अवस्था में हम संसार को अनुभव करते हैं, स्वप्न अवस्था में नींद में मन के अनुभवों को देखते हैं, सुषुप्ति अवस्था में गहरी नींद में होते हैं जिसमें सपनों के लिए भी जगह नहीं होती लेकिन तुरीय अवस्था इस सबमें सबसे गहरी हो जाती है।

इसमें चेतना को अपने वास्तविक स्वरूप के रूप में जानने की बात कही जाती है। तुरीय अवस्था को विचारशून्य अवस्था नहीं कहा जा सकता, बल्कि इसे वह मौन अवस्था कहा जा सकता है, जिसमें साधक अपनी आत्मा को पहचानने का प्रयास करता है। इसीलिए वेदांत में तुरीय को आत्मज्ञान से जोड़कर देखा जाता है।माण्डूक्य उपनिषद में तुरीय अवस्था को सर्वोच्च बताया गया है। यह अवस्था मोक्ष और आत्मज्ञान का द्वार है। इसमें साधक ‘अहं’ से मुक्त होकर शुद्ध चैतन्य का अनुभव करता है।

जब कोई साधक तुरीय अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तो इसमें मन और इंद्रियाँ शांत हो जाती हैं। साधक को आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं लगता। यह अवस्था ध्यान और साधना से प्राप्त होती है। इसमें समय और स्थान का बोध नहीं रहता। साधक केवल साक्षी बन जाता है, उसे न सुख का अनुभव होता है और न दुःख का।

माण्डूक्य उपनिषद में ‘ॐ ‘और चेतना की चार अवस्थाओं का संबंध बताया गया है। इसमें ‘ॐ’ को तीन ध्वनि-खंडों में समझाया गया है –

अ — जाग्रत अवस्था
उ — स्वप्न अवस्था
म — सुषुप्ति अवस्था

और इन तीनों के बाद आने वाला मौन तुरीय से जोड़ा जाता है। जब ॐ का उच्चारण समाप्त होता है और ध्वनि मौन में विलीन हो जाती है, तो वह मौन किसी अलग ध्वनि का नाम नहीं है। उपनिषद उस मौन को उस चौथी अवस्था की ओर संकेत के रूप में प्रस्तुत करता है, जो तीनों अवस्थाओं से परे है।

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