Yashpal Arya खच्चर की लीद नहीं, नीति चाहिए – यशपाल आर्य

Yashpal Arya केदारनाथ धाम में खच्चरों की लीद को लेकर धामी सरकार एक प्रोजेक्ट लाने की तैयारी में है. धामी सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा, जिसे लेकर नेता विपक्ष यशपाल आर्य ने करारा हमला बोला है. उन्होंने कहा, हॉर्सक्रैप नहीं, यह उत्तराखंड के साथ किया गया क्रूर मज़ाक है!

समाधान मिला है खच्चर की लीद में  – Yashpal Arya

आगे यशपाल आर्य ने कहा, उत्तराखंड सरकार ने अब इसे केवल गंदगी नहीं, बल्कि आर्थिक नीति बना दिया है. जब राज्य पलायन, बेरोज़गारी, स्थानीय अधिकार, संसाधनों की लूट, और पहाड़ के भविष्य जैसे गंभीर सवालों से जूझ रहा है तब धामी सरकार को समाधान मिला है खच्चर की लीद में. सरकारी फैसले के अनुसार, केदारनाथ यात्रा मार्ग पर प्रतिदिन चलने वाले लगभग 6000 खच्चरों से गिरने वाली करीब 25 टन लीद को इकट्ठा किया जाएगा. सरकार का दावा है कि इस लीद से ईको-फ्रेंडली पैलेट बनाए जाएंगे, और सालाना लगभग 5460 टन लीद से करीब 50 लाख रुपये की कमाई होगी.

यशपाल आर्य ने कहा, सरकार कहती है – इससे “स्थानीय लोगों की आर्थिकी सुदृढ़ होगी.” सवाल यह है कि क्या यही उत्तराखंड का भविष्य है? बड़े प्रोजेक्ट बाहरियों के, स्थानीय लोगों के हिस्से में लीद? जहां एक तरफ -4081 करोड़ का केदारनाथ रोपवे प्रोजेक्ट – अडानी समूह को दिया गया. 400 करोड़ का केदारनाथ रिडेवलपमेंट – अहमदाबाद की INI डिजाइन स्टूडियो को, 424 करोड़ का बद्रीनाथ रिडेवलपमेंट – फिर वही बाहरी कंपनी को और 1500 करोड़ का सिलक्यारा टनल प्रोजेक्ट – बाहरी ठेकेदार, बाहरी मशीनें, बाहरी मुनाफ़ा, वहीं स्थानीय लोगों के हिस्से में आई -खच्चर की लीद.

उन्होंने कहा, यह विकास नहीं है, यह आर्थिक अपमान है. बाहरियों को करोड़ों, पहाड़ को प्रयोगशाला? उत्तराखंड में निर्माण बाहरियों का, मुनाफ़ा बाहरियों का, नीति बाहर से, डिजाइन बाहर से, निर्णय बाहर से, यहाँ तक किगढ़वाल, कुमाऊँ और जौनसार के गाँवों में डाक बाँटने के लिए भी हरियाणा से डाकिए बुलाए गए और फिर सरकार कहती है – “स्थानीय सशक्तिकरण”. अगर इतना सब देने के बाद भी स्थानीय को सिर्फ़ लीद बचे – तो इसे सशक्तिकरण नहीं, राज्य की बेइज़्ज़ती कहते हैं. यह नीति नहीं, सोच की दरिद्रता है उत्तराखंड की समस्या यह नहीं है कि यहाँ संसाधन नहीं हैं। समस्या यह है कि यहाँ स्थानीय लोगों पर भरोसा नहीं है.

आगे उन्होंने कहा कि उत्तराखंड खच्चरों की लीद से नहीं, हक से चलेगा! उत्तराखंड को लीद नहीं, नीति चाहिए. प्रोजेक्ट नहीं, भागीदारी चाहिए. दया नहीं, अधिकार चाहिए. यह राज्य खच्चर की लीद से नहीं, अपने लोगों की मेहनत, सम्मान और हक़ से आगे बढ़ेगा और अगर सरकार को यही विकास दिखता है – तो जनता को अब सवाल पूछने होंगे, क्योंकि जब बड़े फैसले बाहर होते हैं और छोटे सपने भी पहाड़ से छीने जाते हैं, तो चुप्पी भी अपराध बन जाती है. उत्तराखंड कोई प्रयोगशाला नहीं है और पहाड़ के लोग किसी के हॉर्सक्रैप पर जिंदा नहीं रहेंगे.