Fossil National Park Lapthal देवभूमि में जिन्दा है ‘डरावनी घाटी’ में रहस्य

Fossil National Park Lapthal उत्तराखंड के चमोली जिले की नीती घाटी में स्थित लपथल (Lapthal) क्षेत्र इस ऐतिहासिक भूगर्भीय घटना का सबसे बड़ा गवाह है। करोड़ों साल पुराने टेथिस सागर के अवशेष और सनातन परंपरा में पूजनीय शालिग्राम पत्थरों (जीवाश्म) के इस विशाल भंडार के सामने आने के बाद, अब इस संवेदनशील बॉर्डर एरिया को जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान (Fossil National Park) घोषित करने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. हुकम सिंह और डॉ. रणवीर सिंह ने जून 2025 में इस दुर्गम लपथल क्षेत्र का एक व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। उनके शोध में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। इस क्षेत्र में 15 से 16 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री अवसाद पूरी तरह सुरक्षित अवस्था में मिले हैं।

जीवाश्मों की भरमार Fossil National Park Lapthal

वैज्ञानिकों ने यहां से बेलेमनाइट, गैस्ट्रोपोड और प्राचीन समुद्री जीवों के दुर्लभ जीवाश्म (Fossils) एकत्र किए हैं। सनातनी परंपरा में भगवान विष्णु का स्वरूप माने जाने वाले शालिग्राम पत्थर आमतौर पर नेपाल की गंडकी नदी में मिलते हैं, लेकिन चमोली के लपथल में इसकी प्रचुर मात्रा ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को हैरान कर दिया है।लपथल और रिमखिम के बीच का यह भूभाग अपनी अनोखी भौगोलिक बनावट के कारण ‘भारत का ग्रैंड कैन्यन’ के नाम से मशहूर हो रहा है। इस घाटी की कुछ अनूठी विशेषताएं हैं:

यहां बेहद गहरी और विशाल चट्टानी घाटियां हैं

घाटी इतनी संकरी और गहरी है कि दिन के उजाले में भी इसका एक बड़ा हिस्सा सूर्य की रोशनी से अछूता रहता है, जिसके कारण स्थानीय लोग इसे ‘डरावनी घाटी’ भी कहते हैं।इसी रहस्यमयी घाटी के भीतर आस्था का केंद्र ‘पार्वती कुंड’ भी स्थित है। कुमाऊं, गढ़वाल और तिब्बत (चीन) सीमा के मिलन बिंदु पर स्थित यह ‘कोल्ड डेजर्ट’ अब तक आम दुनिया से कटा हुआ था। पर्यटन विशेषज्ञ अजय भट्ट के अनुसार, नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के कोर जोन में होने के कारण यहां पहले केवल सेना की ही सक्रियता रहती थी।

पहले पर्यटकों को यहां तक पहुंचने के लिए सुमना (चमोली) या मुनस्यारी (पिथौरागढ़) से कई दिनों की कठिन ट्रेकिंग करनी पड़ती थी। लेकिन अब सड़क मार्ग का निर्माण होने से आवाजाही बेहद आसान हो गई है। प्रशासन ने अब स्थानीय निवासियों और पर्यटकों को यहां जाने की अनुमति दे दी है। इसी साल मई में यहां सफलतापूर्वक ‘नीती अल्ट्रा मैराथन’ का आयोजन भी किया जा चुका है, जो इस क्षेत्र के खुलते दरवाजों का प्रमाण है।

सड़क कनेक्टिविटी बढ़ने के बाद इस प्राचीन विरासत को इंसानी दखल और अवैध खनन से बचाने की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। पिथौरागढ़ वन प्रभाग की 2011 से 2021 तक की प्रबंधन योजना में भी इसे ‘जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान’ घोषित करने का मजबूत सुझाव दिया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इसे समय रहते संरक्षित क्षेत्र घोषित कर देती है, तो यह न केवल इस ऐतिहासिक भूगर्भीय खजाने की रक्षा करेगा, बल्कि नीती घाटी के इको-टूरिज्म के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।