Ideal Mother वो तीन बच्चों की माँ है , पहाड़ के संघर्षों से उसका जीवन भरा है जिन हांथों में सुबह बेलन और चिमटा होता है , दिन के बाद उन्हीं हाथों में फर्राटा भरती गाड़ी की कमान आ जाती है। देशभर में महिला शक्ति और उसके हौसले की अनेकों सच्ची कहानिया आप रोजाना पढ़ते होंगे लेकिन आज जो कहानी हम बता रहे हैं वो आपके ज़ज़्बे को और भी मजबूत बना देगी। नारीशक्ति की ये जीती जागती कहानी है उत्तराखंड की जहाँ Driver Rekha Panday ड्राइवर रेखा पांडे ने एक शानदार मिसाल पेश की है.
Ideal Mother पति की खराब सेहत के बाद पकड़ा टैक्सी का स्टेयरिंग

- Ideal Mother कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता, बल्कि सोच छोटी और बड़ी होती है ये मानना है रेखा पांडे का जो अल्मोड़ा जिले के ताड़ीखेत की रहने वाली हैं. वह टैक्सी चलाने का काम पिछले एक महीने से कर रही हैं. रानीखेत से हल्द्वानी तकरीबन 90 किमी की डेली सर्विस देती है. वहीं, दिल्ली, मुम्बई और चेन्नई जैसे महानगरों में ये आम बात हो सकती है, लेकिन उत्तराखण्ड जैसे छोटे और पहाड़ी राज्य के लिए ये वाकई गुड न्यूज़ है

- Ideal Mother ख़ास बात ये है कि रेखा रोजाना सुबह रानीखेत और फिर दिन में हल्द्वानी की सड़को पर टैक्सी के लिए सवारी ढूंढती हैं. दरअसल, रेखा आर्थिक रूप से कमजोर नहीं हैं, लेकिन उनके पति के खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्होंने टैक्सी का स्टेयरिंग पकड़ा है. यही नहीं इसके साथ-साथ वह घर का पूरा कामकाज और बीमार पति की सेवा भी करती हैं. चेहरे पर मुस्कान लिए बुलंद हौसले के संग रेखा सब कुछ कर कर लेती हैं. ऐसे में रेखा का ये कदम स्वरोजगार की तरफ महिलाओं के लिए एक उदाहरण है.

Ideal Mother Ideal Mother रेखा कर रही हैं एलएलबी और नेट की तैयारी
- Ideal Mother जानकारी के मुताबिक रेखा के पास अपनी टैक्सी है, जिसे वो खुद चलाती हैं. दरअसल, रेखा ने बताया कि उनके पति की तबीयत खराब होने के बाद, उन्होंने टैक्सी का काम खुद संभाला. इसके बाद सब कुछ आसान होता चला जा रहा है. अगर रेखा के पढ़ाई की बात करें, तो आप जानकर चौंक जाएंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि रेखा ने डबल एमए किया है. काम के साथ ही रेखा एलएलबी और नेट की भी तैयारी कर रही हैं.

- Ideal Mother रेखा कहती हैं कि महिलाओं को अब चूल्हे-चौके तक सीमित होने के जरूरत नहीं है, बल्कि घर से बाहर निकलने की जरूरत है. इससे वह आत्मनिर्भर बन सकें. महिला सशक्तिकरण में अपना बेहतर योगदान दे सकें.दरअसल, पुरुष प्रधान समाज में आज भी महिलाओं को वो सम्मान नहीं दिया जाता है, जिस सम्मान की वो हकदार हैं, जिससे महिलाएं आज भी सिर्फ और सिर्फ घर की चारदीवारी को लांघने के लिए सौ बार सोचती हैं, लेकिन तीन बेटियों की मां होने के बावजूद रेखा पांडे की ये कहानी महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं.
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