Uttarakhand Heros देवभूमि उत्तराखंड अद्भुत और अनोखी कहानी यों से भरी पड़ी है। यहां वीरगाथाओं और शानदार शख्सियतों की बेमिसाल कहानियों की लंबी श्रंखला है । पहाड़ की वादियों में कुछ ऐसी गुमनाम कहानियां भी हैं जो आज की नई पीढ़ी को जरूर पढ़ना चाहिए। एक ऐसी ही कहानी आज हम आपको बताने ज रहे हैं जो शुरू होती है उत्तराखंड के जिला पिथौरागढ़ के आसपास के क्षेत्र से. यहीं देश की आजादी से पहले देव सिंह बिष्ट नामक एक शख्स अपनी छोटी सी दुकान में घी बेचा करते थे।
Uttarakhand Heros एक गौरवशाली इतिहास का सच

- Uttarakhand Heros देव सिंह की कहानी दुनिया के करोड़ों आम लोगों की तरह ही बेहद साधारण है लेकिन इनकी ज़िंदगी में एकमात्र असाधारण चीज रही इनके बेटे का जन्म. 1906 में क्वीतड़ गांव में ही देव सिंह के घर उनके इस असाधारण बेटे ने जन्म लिया. हालांकि बच्चा तो साधारण ही था लेकिन नियति ने उसकी किस्मत ऐसी लिखी थी कि वह आगे चलकर असाधारण हो गया. देव सिंह ने बड़े प्यार से अपने बेटे का नाम दान सिंह बिष्ट रखा. देव सिंह का ये बेटा बचपन से ही एक तेज बुद्धि का बालक था. परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था शायद इसीलिए पढ़ाई के बजाए बच्चे ने काम करना ही सही समझा.

- Uttarakhand Heros उस समय दान सिंह की उम्र यही कोई 12 साल रही होगी जब उन्होंने लकड़ी का व्यापार करने वाले एक ब्रिटिश व्यापारी के साथ बर्मा (आज के समय में म्यांमार) जाने का फैसला किया. यहां रहते हुए दान सिंह ने लकड़ी व्यापार की बारीकियों पर विशेष ध्यान दिया और इस व्यापार के बारे में खूब नॉलेज इकट्ठी की.बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ घी के बेचने का काम किया. क्योंकि दान सिंह इतने मजबूत परिवार से नहीं थे कि आते ही अपना व्यवसाय शुरू कर दें. दूसरी तरफ दान से के दिल ओ दिमाग से बिजनेस शुरू करने का जुनून भी नहीं उतरा था. उन्होंने तय कर लिया था कि वह किसी ना तरह अपना व्यापार शुरू जरूर करेंगे.

- Uttarakhand Heros गरीबी के दौर से गुजर रहे इस देश में उन दिनों जमींदारों और अंग्रेजों का राज था. ऐसे गुलामी के दौर में इस शख्स ने अपनी मेहनत से लकड़ी समेत अन्य व्यापारों के जरिए दुनिया भर में नाम कमाया. किंग आफ टिंबर के नाम से मशहूर हुए दान सिंह अविभाजित भारत में जम्मू कश्मीर, लाहौर, पठानकोट से वजिराबाद तक लकड़ी की बल्लियों की विशाल मंड़ियां स्थापित करने के बाद अपने लकड़ी व्यापार कश्मीर से लेकर बिहार व नेपाल तक फैलाया. अपने व्यापार द्वारा उस समय उन्होंने उत्तराखंड के साथ साथ देश के अन्य क्षेत्रों के लगभग 6000 लोगों को रोजगार दिया. देखते ही देखते घी बेचने वाले का बेटा दान सिंह बिष्ट अब दान सिंह मालदार बन चुके थे. उन्होंने धीरे धीरे पिथौरागढ़ के अलावा टनकपुर, हल्द्वानी, नैनीताल, मेघालय, असाम तथा नेपाल के बर्दिया और काठमांडू तक में अपनी प्रॉपर्टी खरीद ली.

- Uttarakhand Heros अपनी इस अमीरी को उन्होंने केवल खुद के ऊपर ही नहीं खर्च किया बल्कि इसकी मदद से उन्होंने अपने नाम के साथ दानवीर भी जोड़ लिया. जन कल्याण के लिए उन्होंने कई स्कूल, अस्पताल और खेल के मैदान बनवाए थे.उन्होंने 1951 में नैनीताल वेलेजली गर्ल्स स्कूल को खरीद कर इसका पुनःनिर्माण कराया और अपने पिता स्व. देव सिंह बिष्ट के नाम से यहां एक काॅलेज की शुरुआत की. स्कूल को बनवाने के बाद उन्होंने स्कूल के पास की जमीन खरीद कर एक खेल के मैदान भी बनवाया. दान सिंह ने बहुत धन संपत्ति अर्जित की, बहुत दान किये लेकिन आज उनके नाम से ज्यादा लोग परिचित नहीं हैं. इसकी वजह ये है कि उनके निधन के बाद उनकी संपत्ति को संभालने वाला कोई ना बचा और ना ही उनके जीते जी आजाद भारत में उन्हें किसी तरह की सरकारी मदद मिली.

- Uttarakhand Heros मालदार दान सिंह बिष्ट 10 सितंबर सन 1964 में इस दुनिया को अलविदा कह गए. कुमाउ के इस उभरते बिजनेसमैन का बिजनेस देश ही नहीं बल्कि ब्राजिल तक में विस्तार लेने लग गया था. अंग्रेजी हुकूमत ने भी उनकी व्यापार कौशलता को सम्मान दिया लेकिन भारत की आजादी के बाद अपनी ही देश की सरकार ने उन्हें कम आंका. दान सिंह बिष्ट के कोई बेटा नहीं था और उनकी बेटियां कम उम्र की थीं जिस वजह से उनके बाद उनकी कंपनी डी. एस. बिष्ट एंड संस की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई मोहन सिंह बिष्ट और उनके बेटों ने संभाली. लेकिन किसी में भी दान सिंह जैसी व्यापारीक कौशलता नहीं थी जिस वजह से उनका खड़ा किया हुआ विशाल व्यापार साम्राज्य सिमटता चला गया. ..
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